विषय प्रवेश

जय : दादी मां, मुझे भगवद्गीता की शिक्षा को समझने में बहुत कठिनाई आ रही है. क्या आप इसमें मेरी सहायता करेंगी?

दादी मां : जरूर जय. मुझे बहुत खुशी होगी. तुम्हें जानना चाहिए कि यह पावन ग्रन्थ हमें सिखाता है कि हम संसार में सुख से कैसे रहें. यह हिन्दू धर्म (जिसे सनातन धर्म भी कहा जाता है) का अति प्राचीन पावन ग्रन्थ है. किन्तु इसकी शिक्षा को किसी भी धर्म के अनुनायी समझ सकते हैं और उस पर आचरण कर सकते हैं. गीता में 18 अध्याय हैं और कुल मिलाकर केवल 700 श्लोक हैं. इसकी शिक्षाओं में से प्रतिदिन कुछ का ही अभ्यास करना किसी के लिए भी सहायक हो सकता है. प्रस्तुत है गीता की भूमिका--

प्राचीन काल में एक राज के दो बेटे थे- धृतराष्ट्र और पाण्डु. धृतराष्ट्र जन्म से ही अन्धा था. अतः पाण्डु को राज्य मिला. पाण्डु के पांच पुत्र थे, वे पाण्डव कहलाते थे. धृतराष्ट्र के सौ बेटे थे, उन्हें कौरव कहा जाता था. पाण्डवों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे और कौरवों में दुर्योधन.

पाण्डु के मरने के बाद उनका सबसे बड़ा बेटा युधिष्ठिर राजा बना. दुर्योधन को इससे बहुत ईर्ष्या हुई. वह भी राज्य चाहता था. अतः राज्य को दो भागों में बांट दिया गया, पाण्डवों और कौरवों के बीच. किन्तु दुर्योधन को अपना भाग लेकर सन्तोष न हुआ. उसे तो सारा राज्य चाहिए था. उसने पाण्डवों को मारने और उनका राज्य हथियाने के लिए अनेक दुष्टता भरे षड्यन्त्र किये. अन्त में किसी तरह उसने पाण्डवों का सारा राज्य हड़प ही लिया और बिना युद्ध के उसे पाण्डवों को लौटाने से साफ मना कर दिया. भगवान श्रीकृष्ण तथा अन्य लोगों द्वारा शान्तिवार्ता हेतु किये गये सभी प्रयत्न निष्फल हुए. इसलिए महाभारत के युद्ध को टालना असम्भव हो गया.

पाण्डव लड़ना नहीं चाहते थे, किन्तु उनके सामने दो ही रास्ते थे. या तो वे अपने अधिकारों के लिए लड़ें (जो उनका कर्तव्य भी था) या लड़ाई से भागकर शान्ति और अहिंसा के नाम में हार स्वीकार करें. लड़ाई के मैदान में पांचों पाण्डवों में से एक अर्जुन के सामने लड़ाई में इन मार्गों में से कौन सा चुने, यह समस्या उठी.

अर्जुन को दो मार्गों में से एक को चुनना था. या तो वह युद्ध करे और अपने परम पूज्य गुरु की, परम प्रिय मित्रों की, निकट सम्बन्धियों और निर्दोष सैनिकों की हत्या करे, जोकि दूसरे पक्ष की ओर से लड़ रहे थे, या शान्तिप्रिय और अहिंसक होकर युद्ध से भाग खड़ा हो. गीता के सम्पूर्ण अठारह अध्याय संशयग्रस्त अर्जुन और उसके सर्वश्रेष्ठ मित्र, हितैषी और ममेरे भाई भगवान कृष्ण, जो ईश्वर के अवतार थे, के बीच लगभग पांच हजार एक सौ वर्ष पहले नई दिल्ली के पास कुरुक्षेत्र के लड़ाई के मैदान में हुआ संवाद है. यह संवाद अन्धे धृतराष्ट्र को उसके सारथी संजय ने सुनाया था. महाकाव्य महाभारत में यह संवाद अंकित है.

मनुष्य का हो या अन्य जीवों का--सबका जीवन पवित्र है. अहिंसा हिन्दू धर्म का एक मूल सिद्धान्त है परम धर्म है. इसलिए अगर तुम महाभारत के युद्ध की भूमिका को ध्यान में नहीं रखते, तो तुम्हें भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को उठो और लड़ो की सलाह और अहिंसा के सिद्धान्त के बारे में शंका हो सकती है.

याद रखो कि परमप्रभु श्रीकृष्ण और उनके भक्तमित्र अर्जुन के बीच में यह आध्यात्मिक संवाद किसी मन्दिर या एकान्त वन में अथवा किसी पर्वत शिखा पर नहीं हुआ, वरन् होता है युद्ध की पहली संध्या पर. लड़ाई के मैदान में.

जय : बहुत ही दिलचस्प कहानी है यह तो, दादी मां. क्या आप मुझे और बतायेंगी?

दादी मां : अगर तुम वहां आओगे जय, जहां मैं रोज शाम को बैठती हूं, तो मैं रोज तुम्हें एकएक अध्याय करके पूरी बात बताऊंगी. हां, इस बात का पूरा ध्यान रखना कि तुम्हारी पढ़ाई का काम अधूरा न रहे और तुम्हारे पास सुनने के लिए काफी समय हो. अगर तुम्हें यह मंजूर है, तो कल से ही शुरू करें.

जय : धन्यवाद, दादी मां. मैं और सुनने के लिए जरूर वहां आऊंगा.

अध्याय एक

अर्जुन का विषाद और मोह

जय : दादी मां, सबसे पहले तो मैं यह जानना चाहूंगा कि युद्ध क्षेत्र में भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच यह संवाद कैसे हुआ?

दादी मां : यह घटना इस प्रकार घटी. महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला ही था. श्रीकृष्ण और दूसरे लोगों के युद्ध को टालने के लिए किये गये सभी प्रयत्न निष्फल हुए थे. जब युद्धक्षेत्र में सैनिक जमा हो गये थे, तो अर्जुन ने भगवान कृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाने की प्रार्थना की ताकि वह उन लोगों को देख सके, जो युद्ध के लिए तैयार थे. युद्धक्षेत्र में अपने सभी सम्बन्धियों, मित्रों और सैनिकों को देखकर और उनके मरने के भय से अर्जुन के हृदय में करुणा जाग उठी.

जय : दादी मां, करुणा का क्या अर्थ है?

दादी मां : करुणा का अर्थ दया नहीं है, जय. दया का अर्थ होगा, दूसरों को अपने से नीचा समझना बेचारे, निस्सहाय प्राणी मानना. अर्जुन तो उनकी पीड़ा और अपनी ही तरह उनकी दुर्भाग्य भरी स्थिति अनुभव कर रहा था. अर्जुन एक महान योद्धा था, जो बहुत से युद्ध लड़ चुका था और इस युद्ध के लिए भी तैयार था. किन्तु अचानक मन में जगी करुणा के कारण उसकी युद्ध करने की इच्छा जाती रही. वह युद्ध के दोषों के बारे में बोलने लगा और दुःखी मन से रथ के पीछे के भाग में बैठ गया. उसे युद्ध का कोई लाभ दिखाई न दिया. उसे पता न था कि वह क्या करे.

जय : मैं उसे दोष नहीं देता. मैं भी दूसरों से लड़ना नहीं चाहूंगा. लोग लड़ते क्यों हैं, दादी मां? युद्ध क्यों होते हैं?

दादी मां : जय, युद्ध केवल राष्ट्रों के बीच में ही नहीं होते, झगड़े तो दो व्यक्तियों के बीच में भी होते हैं भाइयों और बहनों के बीच में, पतिपत्नी के बीच में, मित्रों और पड़ौसियों के बीच में. इसका मूल कारण है कि लोग अपने स्वार्थ भरे उद्देश्यों और इच्छाओं का त्याग नहीं कर सकते. अधिकांश युद्ध सत्ता और अधिकार के लिए लड़े जाते हैं. अधिकांश समस्याएं शान्ति से सुलझाई जा सकती हैं, यदि लोग समस्या को दोनों पक्षों से देख सकें और कोई समझौता कर सकें. युद्ध अन्तिम विकल्प (उपाय, चारा) होना चाहिये. हमारे धर्मग्रन्थों का कहना है दूसरों के प्रति हिंसा नहीं करनी चाहिये. अर्नुचित हत्या सब स्थितियों में दण्डनीय है. भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने अधिकारों के लिए युद्ध करने को प्रेरित करते हैं, अनावश्यक हत्या करने के लिए नहीं. घोषित युद्ध में लड़ना अर्जुन के लिए क्षत्रिय होने के कारण कर्तव्य था, पृथ्वी पर शान्ति, कानून और व्यवस्था स्थापित करने के लिए.

हम सब प्राणियों के भीतर भी युद्ध चलते ही रहते हैं. हमारी नकारात्मक और सकारात्मक-- बुरी और अच्छी-- शक्तियां सदा लड़ती रहती हैं. हमारी नकारात्मक शक्तियों के प्रतिनिधि हैं कौरव. और पाण्डव सकारात्मक शक्तियों के प्रतिनिधि हैं. गीता में शिक्षा को चित्रित करने के लिए कहानियां नहीं हैं, इसलिए मैं तुम्हारी सहायता के लिए दूसरे स्रोतों से कुछ कहानियां कहूंगी.

तो प्रस्तुत है नकारात्मक और सकारात्मक विचारों की आपस में लड़ाई की एक कथा, जो महाभारत में स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाई थी.

1 . सत्यवादी

एक बार कहीं एक महान साधु रहता था. वह सदा सत्य बोलने के लिए प्रसिद्ध था. उसने सच बोलने की शपथ ली थी और वह सत्यमूर्ति के नाम से प्रसिद्ध था. वह जो भी कहता था, लोग उसका विश्वास करते थे, क्योंकि जिस समाज में वह रहता और तपस्या करता था, उसमें उसने महान कीर्ति अर्जित कर ली थी.

एक दिन शाम के वक्त एक डाकू किसी व्यापारी को लूटकर उसकी हत्या करने के लिए उसका पीछा कर रहा था. व्यापारी अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था. डाकू से बचने के लिए वह व्यापारी गांव से बाहर उस वन की ओर भागा, जहां साधु रहता था.

व्यापारी ने अपने आपको बहुत सुरक्षित महसूस किया क्योंकि जिस जंगल में वह छिपा था, उसका पता लगाना डाकू के लिए असम्भव था. किन्तु साधु ने उस दिशा को देख लिया था, जिस ओर व्यापारी भागा था.

डाकू साधु की कुटिया के पास आया. उसने साधु को प्रणाम किया. डाकू को पता था कि साधु सच ही बोलेगा और उसका विश्वास किया जा सकता था. इसलिए उसने साधु से पूछा, क्या आपने किसी आदमी को भागते हुए देखा है? साधु जानता था कि डाकू अवश्य ही किसी को लूटकर उसकी हत्या करने के लिए उसे ढ़ूंढ़ रहा होगा. अब साधु के सामने बहुत बड़ी समस्या थी. यदि वह सच बोलता है, तो निश्चित ही व्यापारी मारा जायेगा. और यदि वह झूठ बोलता है, तो वह झूठ बोलने के पाप का भागी होगा और अपनी कीर्ति खो बैठेगा. अहिंसा और सत्य सभी धर्मों की दो महत्त्वपूर्ण शिक्षाएं हैं, जिनका हमें पालन करना चाहिये. अब यदि इन दोनों में से एक को चुनना पड़े, तो किसे चुनें? यह बहुत कठिन चुनाव है.

अपने सत्य बोलने के स्वभाव के कारण साधु ने कहा, हां, मैंने किसी को उस ओर भागते देखा है. इस प्रकार डाकू व्यापारी को ढ़ूंढ़कर उसे मारने में सफल हुआ. सच को छिपाकर साधु एक व्यक्ति का जीवन बचा सकता था. किन्तु उसने ध्यान से नहीं सोचा और गलत निर्णय लिया.

भगवान कृष्ण का अर्जुन को यह कहानी सुनाने का उद्देश्य अर्जुन को यह शिक्षा देना था कि कभीकभी दो में से किसी एक को चुनना आसान नहीं होता है. अर्जुन के सामने भी यही समस्या थी. भगवान कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि एक व्यक्ति की हत्या करने के पाप में डाकू के साथ साधु भी भागी है. इसलिए जब दो आदर्शों (सिद्धान्तों) में टकराव होता है तो हमें देखना होगा कि कौन सा सिद्धान्त ऊंचा है. अहिंसा सबसे ऊंची है, इसलिए साधु को एक व्यक्ति के प्राण बचाने के लिए इस परिस्थिति में झूठ बोलना चाहिये था. यदि सच बोलने से एक व्यक्ति को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचती है, तो सच बोलना जरूरी नहीं है. कभीकभी जीवन की वास्तविक स्थितियों में धर्म का पालन आसान नहीं है और कभीकभी इस बात का निर्णय करना भी बहुत कठिन है कि धर्म-अधर्म क्या है. ऐसी स्थिति में विद्वानों की सलाह लेनी चाहिये.

भगवान कृष्ण ने एक और उदाहरण भी दिया है कि एक डाकू किसी गांव को लूटने और ग्रामवासियों की हत्या करने गया था. ऐसी अवस्था में डाकू की हत्या करना अहिंसात्मक कर्म होगा, क्योंकि एक की हत्या करने से बहुत से व्यक्तियों के प्राण बचेंगे. स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को बहुत बार महाभारत के युद्ध को जीतने के लिए और सब पापियों को ख़त्म करने के लिए ऐसे निर्णय लेने पड़े थे.

जय, याद रखो, झूठ मत बोलो, किसी की हत्या न करो, न किसी को हानि पहुंचाओ. किन्तु सबसे बड़ी प्राथमिकता है किसी की जान बचाना.

पहले अध्याय का सार अर्जुन ने अपने मित्र भगवान कृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले जाने को कहा, ताकि वह कौरवों और पाण्डवों की सेना को देख सके. विरोधी पक्ष में अपने मित्रों और सम्बन्धियों को देखकर, जिनकी हत्या युद्ध जीतने के लिए उसे करनी होगी, अर्जुन के हृदय में गहरी करुणा उपजी. उसका मन संशय से भर उठा. उसने युद्ध के दोषों का वर्णन किया और युद्ध करने से मना कर दिया.

अध्याय दो

ब्रह्मज्ञान

जय : दादी मां, अगर अर्जुन के हृदय में उन सबके लिए, जिन्हें उसे युद्ध में मारना था, इतनी करुणा भरी थी, तो वह कैसे रणक्षेत्र में जाकर युद्व कर सकता था?

दादी मां : बिल्कुल यही तो अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा था. उसने कहा, मैं युद्ध में अपने बाबा, गुरु और अन्य सब सम्बन्धियों पर कैसे बाण चला सकता हूं? (गीता 2.04)

(yahaM #2 hO AQyaaya # AaOr #04 hO Xlaaok #)

अर्जुन की बात ठीक थी. वैदिक संस्कृति में गुरु और वृद्धजन आदर के पात्र हैं. किन्तु धर्मग्रन्थों में यह भी कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति, जो गलत या गैर कानूनी काम तुम्हारे या किसी और के साथ करता है अथवा ऐसे कार्यों का समर्थन करता है, तो वह सम्मान का पात्र नहीं है. उसे दण्ड दिया जाना चाहिये.

अर्जुन अपने कर्तव्य के प्रति संशयग्रस्त था. उसने भगवान कृष्ण से मार्गदर्शन की प्रार्थना की. भगवान कृष्ण ने तब उसे आत्मा और शरीर के सही ज्ञान की शिक्षा दी.

जय : आत्मा क्या है, दादी मां, उसका रूप क्या है?

दादी मां : आत्मा वह तत्त्व है, जिससे हमें अपने होने का भाव होता है. आत्मा शरीर की तरह न पैदा होती है, न कभी मरती है. हमारा शरीर ही पैदा होता है और मरता है, आत्मा नहीं. आत्मा अमर है, सदा रहने वाली है. आत्मा शरीर को सहायता देती है, आत्मा शरीर का आधार है. आत्मा के बिना शरीर मर जाता है. आत्मा हमारे शरीर, मस्तिष्क और इन्द्रियों को शक्ति देती है, वैसे ही जैसे हवा आग को. आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, आग नहीं जला सकती, हवा नहीं सुखा सकती, न ही जल गला सकता. इसलिए हमें शरीर के मरने पर शोक नहीं करना चाहिये क्योंकि शरीर के भीतर की आत्मा कभी नहीं मरती है. (गीता 2.2324)

जय : दादी मां, आत्मा और शरीर में क्या अन्तर है?

दादी मां : सब शरीरों में एक वही आत्मा निवास करती है. समय के साथ हमारा शरीर बदलता है. हमारा बुढ़ापे का शरीर बचपन के शरीर से अलग होता है. किन्तु आत्मा नहीं बदलती है. आत्मा बचपन के शरीर को ग्रहण करती है, जवानी के शरीर को और बुढ़ापे के शरीर को ग्रहण करती है, जब तक जीवन है. और मृत्यु के बाद दूसरा नया शरीर ग्रहण कर लेती है. (गीता 2.13) आत्मा सार्वभौमिक और सार्वकालिक है. अर्थात् हर जगह और हर समय में रहती है. व्यक्ति के शरीर में निवास करने वाली आत्मा को जीवात्मा या जीव भी कहा जाता है. यदि हम आत्मा की तुलना वन से करें, तो व्यक्तिगत आत्मा (या जीव) की तुलना वन के पेड़ से की जा सकती है.

शरीर को आत्मा का वस्त्र कहा गया है. जैसे हम पुराने, फटे हुए वस्त्र को त्यागकर नये वस्त्र को धारण करते हैं, वैसे ही आत्मा मृत्यु के बाद पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ले लेती है. इस प्रकार मृत्यु आत्मा के वस्त्र बदलने जैसा है. (गीता 2.22) सभी जीव जन्म और मृत्यु के बीच में दिखाई देते हैं. वे जन्म के पहले और मृत्यु के बाद नहीं दिखते, उस समय वे अपने अदृश्य रूप में रहते हैं. (गीता 2.28) इसलिए हमें शरीर के मरने का शोक नहीं करना चाहिये. हमलोग शरीर नहीं हैं. हम शरीर में रहनेवाली आत्मा हैं. यानि शरीर को धारण किये हुए आत्मा. मृत्यु का अर्थ केवल यही है कि हमारी आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में चली जाती है.

जय : तब अर्जुन युद्धक्षेत्र में हुई प्रियजनों की मृत्यु पर शोक क्यों कर रहा था? वह लड़ना क्यों नहीं चाहता था?

दादी मां : अर्जुन एक महान योद्धा था, जय, पर वह युद्ध से भागकर एक संन्यासी का सहज जीवन बिताना चाहता था. भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग के सुन्दर विज्ञान अथवा शान्तिपूर्ण सार्थक जीवन का शास्त्र देकर हमें जीवनसंग्राम का सामना करना सिखाया है. गीता के तीसरे अध्याय में हमें इसके बारे में और अधिक बताया गया है.

अर्जुन को युद्ध के परिणामों की चिन्ता थी. किन्तु भगवान कृष्ण हमें परिणामों या फलों की, जैसे-- लाभहानि, जयपराजय, सफलताअसफलता की अधिक चिन्ता किये बिना अपने कर्तव्य करने को कहते हैं. (गीता 2.38) अब यदि तुम हर समय अपनी पढ़ाई के परिणामों की ही चिन्ता करते रहोगे, तो तुम कभी भी अपना मन अच्छी तरह पढ़ाई में नहीं लगा सकोगे. हमेशा असफलता का भय तुम्हें सताता रहेगा.

जय : पर दादी मां, यदि अर्जुन विजय या कुछ पाने के लिए नहीं लड़ रहा था, तो वह पूरे मन से युद्ध कैसे कर सकता था?

दादी मां : अवश्य ही अर्जुन को विजय के लिए लड़ना था, पर उसे युद्ध करते समय परिणामों की चिन्ता करके अपनी इच्छाशक्ति को कमजोर नहीं करना चाहिये था. उसे युद्ध के समय हर पल अपना सारा ध्यान, अपनी सारी शक्ति उसी में लगानी चाहिये थी. वही शक्ति सर्वश्रेष्ठ परिणाम को देने वाली है.

भगवान कृष्ण हमें बताते हैं कि हमारा अपने कर्मों पर तो वश है, किन्तु अपने कर्मों के फलों पर नहीं. (गीता 2.47) हरि भल्ला का कहना है : एक किसान किस प्रकार अपनी भूमि में क्या करता है, यह तो पूरापूरा उसके वश में है, पर उसमें उपजी फसल कैसी होगी या नहीं होगी इसपर उसका कोई वश नहीं है. किन्तु बिना भूमि पर पूरी शक्ति और साधन के साथ काम किये बिना वह किसी भी फसल की आशा नहीं कर सकता.

हमें वर्तमान में पूरी शक्ति से कर्म करना चाहिये, भविष्य की चिन्ता भविष्य को ही करने दें.

जय : क्या आप मुझे सफलता के रहस्यों को और विस्तार से बतायेंगी, जैसे कि अर्जुन को भगवान कृष्ण ने बताया था.

दादी मां : हमें अपने काम या पढ़ाई में पूरी तरह इस प्रकार खो जाना चाहिये, जिससे और किसी भी बात का यहां तक कि काम के फल का भी ध्यान न रहे. अपने कर्म के श्रेष्ठतम परिणामों की प्राप्ति के लिए हमें पूरे मनको अपने काम पर ही केन्द्रित करना चाहिये. इधर उधर नहीं.

कर्म को परिणामों की चिन्ता किये बिना पूरे मन के साथ करना चाहिये. यदि हम अपना पूरा ध्यान और पूरी शक्ति कर्म में ही लगा सकें और अपनी शक्ति को परिणामों के चिन्तन में न बिखरने दें, तो हमारे कर्म का परिणाम अच्छा ही होगा. परिणाम, कर्म में लगाई गई शक्ति पर निर्भर करता है. कर्म करते समय हमें फल की चिन्ता न करने के लिए कहा गया है. इसका अर्थ यह नहीं कि हम परिणामों की ओर बिल्कुल ही ध्यान न दें. किन्तु हमें हर समय केवल लाभकारी फलों की आशा भी नहीं करनी चाहिये.

सार्थक जीवन जीने का रहस्य है पूरी तरह सक्रिय होना और शक्ति भर काम करना. बिना अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों और परिणामों का चिन्तन किये. आत्मज्ञानी पुरुष सब की भलाई के लिए काम करता है.

जय : आत्मज्ञानी व्यक्ति के क्या लक्षण हैं, दादी मां?

दादी मां : आत्मज्ञानी (स्थितप्रज्ञ) एक पूर्ण व्यक्ति है, जय. भगवान कृष्ण कहते हैं कि पूर्ण व्यक्ति का मन कठिनाइयों से विचलित नहीं होता है. वह सुख के पीछे नहीं भागता है. भय, इच्छा (काम), लोभ और मोह से मुक्त होता है और मन व इन्द्रियों पर अंकुश रखता है. (गीता 2.56) आत्मज्ञानी (स्थितप्रज्ञ) व्यक्ति को क्रोध नहीं आता है, वह सदा शान्त और प्रसन्न रहता है.

जय : दादी मां, हम क्रुद्ध होने से कैसे बच सकते हैं?

दादी मां : हमें क्रोध आता है, जब हमारी इच्छा पूरी नहीं होती. (गीता 2.62) अतः क्रोध को काबू में रखने का श्रेष्ठतम उपाय है इच्छाओं का दास न होना. हमें अपनी इच्छाओं को सीमित करने की ज़रूरत है. इच्छाएं हमारे मन में पैदा होती हैं, इसलिए हमें अपने मन को काबू में रखना चाहिये. यदि हम मन को काबू में नहीं रखते हैं, तो हम विना पाल के जहाज़ की तरह भटक जायेंगे. सुख की कामना हमें पाप की अंधेरी गली में ले जाती है, मुसीबतों में डालती है और हमारी प्रगति को रोकती है. (गीता 2.67) एक विद्यार्थी होने के नाते तुम्हें अपने लिए सुख से ऊंचा ध्येय निश्चित करना चाहिये. पूरे प्रयत्न से पढ़ाई में मन लगाना चाहिये.

अर्जुन इस प्रकार के ध्यान केन्द्रित करने वाले का बहुत अच्छा उदाहरण है. उसके विषय में एक कथा सुनो.

2 . दीक्षान्त परीक्षा

गुरु द्रोण कौरवों और पाण्डवों दोनों को अस्त्रशस्त्र विद्या की शिक्षा देने वाले गुरु थे. उनकी सैनिक शिक्षा की समाप्ति के बाद अंतिम परीक्षा का समय आया. द्रोण ने समीप के एक पेड़ की शाखा पर लकड़ी का एक बाज़ रखा. कोई नहीं जानता था कि वह केवल एक खिलौना था. वह असली बाज़ जैसा लगता था. दीक्षान्त परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए सभी छात्रों को एक बाण से बाज़ का सिर काटना था.

गुरु द्रोण ने सबसे पहले पाण्डवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर को बुलाकर कहा, तैयार हो जाओ, बाज़ को देखो और मुझे बताओ कि तुम क्या देख रहे हो? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, मैं आकाश को देख रहा हूं, वादलों को, पेड़ के तने को, शाखाओं को वहां बैठे हुए बाज़ को देख रहा हूं.

गुरु द्रोण इस उत्तर से बहुत प्रसन्न नहीं हुए. उन्होंने एकएक करके सभी छात्रों से वही प्रश्न पूछा. उनमें से प्रत्येक ने वैसा ही उत्तर दिया. तब परीक्षा के लिए अर्जुन की बारी आई.

द्रोण ने अर्जुन से कहा, तैयार हो जाओ. बाज़ को देखो और मुझे बताओ तुम क्या देख रहे हो?

अर्जुन ने उत्तर दिया, मैं केवल बाज़ को देख रहा हूं, और कुछ भी नहीं.

द्रोण ने तब दूसरा प्रश्न पूछा, यदि तुम बाज़ को देख रहे हो, तो मुझे बताओ उसका शरीर कितना मज़बूत है और उसके पंखों का रंग क्या है?

अर्जुन ने उत्तर दिया, मैं केवल उसके सिर को देख रहा हूं, सारे शरीर को नहीं.

गुरु द्रोण अर्जुन के उत्तर से बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने उसे परीक्षा पूर्ण करने की आज्ञा दी. अर्जुन ने सहज ही एक ही बाण से बाज़ का सिर काट गिराया, क्योंकि वह अपने लक्ष्य पर एकाग्रचित्त होकर ध्यान केन्द्रित कर रहा था. परीक्षा में उसे पूरी सफलता मिली.

अर्जुन अपने समय का न केवल सबसे बड़ा योद्धा था, वरन् वह एक करुणा भरा कर्मयोगी भी था. भगवान कृष्ण ने गीता का ज्ञान देने के लिए अर्जुन को ही माध्यम चुना.

हम सभी को अर्जुन के पदचिन्हों पर चलना चाहिये. गीता पढ़ो, आगे बढ़ो और अर्जुन की तरह बनो. जो भी काम तुम करो, पूरे मन से एकाग्रचित्त होकर करो. गीता के कर्मयोग का यही मूलमंत्र है और तुम्हारे हर काम में सफलता का यही रहस्य है.

अध्याय 2 का सार भगवान कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से हमें आत्मा और शरीर में अन्तर की शिक्षा दी. हम केवल शरीर ही नहीं, आत्मा हैं. आत्मा अजन्मा है और अविनाशी है. मानवीय और अमानवीयों सभी शरीरों में एकही आत्मा रहती है. इस प्रकार हम सब एक दूसरे से जुड़े हैं. सफलता या असफलता की चिन्ता किये बिना हमें अपनी योग्यता के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिये. हमें अपनी असफलताओं से शिक्षा लेनी चाहिये और असफलताओं से हार न मानकर आगे बढ़ना चाहिये. पूर्ण (स्थितप्रज्ञ) व्यक्ति बनने के लिए हमें अपनी इच्छाओं पर काबू पाना ज़रूरी है.

अध्याय तीन

कर्मयोग़ या कर्तव्यमार्ग

जय : दादी मां, हमें अपनी इच्छाओं पर काबू क्यों करना चाहिये?

दादी मां : जब इन्द्रियों के सुख के लिए ग़लत व्यवहार चुनते हो, तो तुम उसके परिणामों को भी चुनते हो. इसीलिए कोई भी काम सबके भले के लिए किया जाना चाहिये, अपनी इच्छाओं को शान्त करने के लिए या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं. कर्मयोग के अभ्यास करने वाले को कर्मयोगी कहते हैं. कर्मयोगी सेवा का सही मार्ग चुनता है और अपने काम को पूजा का रूप दे देता है. कर्मयोग में कोई भी काम किसी दूसरे काम से अधिक या कम महत्त्वपूर्ण नहीं है.

जय : चाचा हरि पिछले वर्ष भगवान की खोज में घर छोड़कर एक आश्रम में चले गये. क्या भगवान की खोज में हमें घर छोड़ना पड़ता है?

दादी मां : नहीं, बिल्कुल नहीं. गीता में भगवान कृष्ण ने भगवान की प्राप्ति के लिए हमें अलगअलग रास्ते दिखलाये हैं. जो मार्ग तुम चुनते हो, वह तुम्हारी व्यक्तिगत प्रकृति पर निर्भर करता है. साधारणतः दुनिया में दो तरह के लोग हैं-- अन्तर्मुखी. (introvert), अध्यनशील और बहिर्मुखी या कर्मशील (extrovert). चाचा हरि जैसे अन्तर्मुखी लोगों के लिए आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग सर्वश्रेष्ठ है. इस मार्ग का अनुसरण करने वाले किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाते हैं, जिनकी सही देखरेख में वे वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं. इस मार्ग में हम इस ज्ञान की प्राप्ति करते हैं कि हम कौन हैं और हम कैसे सुखशान्ति का जीवन बिता सकते हैं.

जय : क्या भगवान को समझने और पाने के लिए हमें सब शास्त्रग्रन्थों को पढ़ना ज़रूरी है?

दादी मां : हमारे धर्म में अनेक शास्त्रग्रन्थ हैं. चार वेद, एक सौ आठ उपनिषद्, अठारह पुराण, रामायण, महाभारत, सूत्रग्रन्थ और अन्य बहुत से ग्रन्थ हैं. उन सब का अध्ययन करना एक कठिन काम है. किन्तु भगवान कृष्ण ने हमारे जानने योग्य हर चीज़ को गीता में कह दिया है. गीता में आज के समय के लिए सभी वेदों और उपनिषदों का सार उपलब्ध है.

जय : चाचा पुरी किसान हैं और उनकी कोई रुचि गीता पढ़ने में नहीं है. वे कहते हैं, गीता बहुत कठिन है और उनके जैसे साधारण लोगों के लिए नहीं है. तो उन्हें भगवान की प्राप्ति कैसे हो सकती है?

दादी मां : चाचा पुरी को कर्मयोग का मार्ग ग्रहण करना चाहिये. गीता के इस अध्याय में उसका वर्णन है. यह कर्तव्य या निष्काम सेवा का मार्ग है. यह मार्ग अधिकांश लोगों के लिए अच्छा है, जो परिवार को पालने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं और जिनके पास शास्त्रों को पढ़ने के लिए समय नहीं है, न उनमें रुचि. इस मार्ग पर चलने वालों के लिए घर छोड़कर किसी आश्रम में जाना ज़रूरी नहीं. वे अपने स्वार्थ भरे उद्देश्यों का त्याग कर के समाज के भले के लिए काम करते हैं, केवल अपने लिए नहीं.

जय : लेकिन अगर लोग अपने स्वार्थ भरे उद्देश्यों के लिए काम करेंगे, तो वे अधिक परिश्रम करेंगे, हैं न दादी मां.

दादी मां : यह तो सच है कि यदि लोग अपने स्वार्थ भरे लाभ के लिए काम करेंगे, तो अधिक कमा सकेंगे, किन्तु ऐसा करने से उन्हें स्थायी सुख और शान्ति नहीं मिलेगी. केवल वे ही लोग जो सबके भले के लिए निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य पूरा करेंगे, सच्ची शान्ति और सन्तोष पायेंगे.

जय : यदि लोग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए काम नहीं करेंगे, तो क्या वे तब भी अच्छी तरह काम करेंगे और आलसी नहीं हो जायेंगे?

दादी मां : सच्चा कर्मयोगी व्यक्तिगत लाभ के बिना भी परिश्रम करता है. अज्ञानी केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही काम करते हैं. दुनिया सहज रूप से इसीलिए चल रही है कि लोग अपना कर्तव्य पूरा करते हैं. मातापिता परिवार के पोषण के लिए परिश्रम करते हैं. और बच्चे अपने हिस्से का काम. कोई भी हर समय निष्क्रिय या निठल्ला नहीं रह सकता. अधिकांश लोग किसी न किसी काम में लगे ही रहते हैं और यथाशक्ति काम करते हैं. सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने मानव को अपनी पहली शिक्षा दी, जब उन्होंने कहा तुम सब प्रगति करो, फलोफूलो. एक दूसरे की सहायता करते हुए और सही रूप में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए.

जय : यदि केवल अपने ही लाभ के लिए परिश्रम करें, तो क्या होगा?

दादी मां : तो वे पाप करेंगे. जय, दूसरों पर अपने काम के असर का ध्यान न करके स्वार्थवश काम करना गलत है. भगवान कृष्ण ने ऐसे लोगों को चोर, बेकार और पापी कहा है (गीता 3.1213). हमें कभी भी केवल अपने लिए जीना और काम करना नहीं चाहिये. हमें एकदूसरे की सहायता और सेवा करनी चाहिये.

जय : जो व्यक्ति भगवान ब्रह्मा की शिक्षा पर चलता है और समाज की भलाई के लिए काम करता है, उसे क्या लाभ होता है?

दादी मां : ऐसे व्यक्ति को इस जीवन में शान्ति और सफलता मिलती है, ईश्वर की प्राप्ति होती है और पृथ्वी पर फिर उसका जन्म नहीं होता.

अध्याय 3 में जिस निःस्वार्थ सेवा के बारे में विचार किया गया है, वह जीवन में कैसा अद्भुत काम करती है, इसको बताने में हमारे समय की एक सच्ची कहानी है.

3. सर अलैक्जैण्डर फ्लैमिंग

एक दिन स्काटलैण्ड के एक ग़रीब किसान फ्लैमिंग ने, अपने परिवार को पालने के लिए अपना रोज़ का काम करते समय सहायता के लिए किसी की चीख़ सुनी. यह चीख़ पड़ौस के एक दलदल से आ रही थी. अपना काम छोड़कर वह किसान दलदल की ओर भागा. वहां कमर तक दलदल में डूबा एक आतंकित लड़का अपने को मुक्त करने के लिए चीख़ रहा था, हाथ पैर पीट रहा था. किसान फ्लैमिंग ने लड़के को उस भयानक मौत से बचाया.

अगले दिन, उस स्काटलैण्डवासी के साधारण घर के सामने एक भव्य घोड़ागाड़ी रुकी. सुरुचिपूर्ण वस्त्र पहने एक कुलीन व्यक्ति उसमें से नीचे उतरा. अपना परिचय उसने उस बच्चे के पिता के रूप में दिया जिसे किसान फ्लैमिंग ने बचाया था.

उस कुलीन व्यक्ति ने कहा, मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं और पुरस्कार के रूप में कुछ देना भी. आपने मेरे बेटे की जान बचाई है.

मैंने जो किया है, उसके लिए मुझे कोई मूल्य नहीं चाहिये, मैं कुछ नहीं ले सकता. स्काटलैण्ड के किसान ने उसका दान अस्वीकार करते हुए कहा.

उसी समय किसान का अपना बेटा उस झौंपड़े से बाहर निकलकर दरवाजे पर आया.

यह आपका बेटा है? कुलीन व्यक्ति ने पूछा.

हां, किसान ने गर्व से उत्तर दिया.

तो मैं आपके साथ एक सौदा करूंगा. मुझे इस लड़के को उसी स्तर की शिक्षा दिलाने की अनुमति दें, जो मेरे अपने बेटे को मिलेगी. यदि इस लड़के में अपने पिता जैसा कोई भी गुण हुआ, तो वह निस्सन्देह बड़ा होकर ऐसा आदमी बनेगा, जिस पर हम दोनों गर्व कर सकें.

और उसने वैसा ही किया. किसान फ्लैमिंग के बेटे ने सर्वोत्तम स्कूलों में शिक्षा पाई और समय आने पर लन्दन के सैण्ट मैरी हास्पिटल मैडिकल स्कूल से उपाधि पाई और विश्वभर में पैन्सलिन के आविष्कर्ता सर अलैक्ज़ैण्डर फ्लैमिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए.

बरसों बाद उस कुलीन पिता का वही बेटा, जिसे दलदल से बचाया गया था, नमोनिया का शिकार हुआ और इस समय उसकी जान किसने बचाई? पैन्सलिन ने.

उस कुलीन व्यक्ति का नाम था लॉर्ड रेण्डोल्फ चर्चिल.

उसके बेटे का नाम? सुप्रसिद्ध सर विन्स्टन चर्चिल.

किसी ने कहा, जो जाता है वही घूमकर आता है. कर्म का यही नियम है. कारण और कार्य का सिद्धान्त. किसी दूसरे के सपने को पूरा करने में सहायता करो, परमात्मा की कृपा से तुम्हारा सपना भी पूरा होगा.

जय : दादी मां, कृपया मुझे सच्चे कर्मयोगियों के कुछ और उदाहरण दें.

दादी मां : तुमने रामायण की कहानी तो पढ़ी है. भगवान राम के ससुर जनकपुर के राजा जनक थे. उन्होंने भगवान को पायाअपनी प्रजा की सेवा अपने बच्चों की तरह करके, निःस्वार्थ भाव से और अपने कर्म के फल के प्रति कोई मोह न रखकर. उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन भगवान की पूजा के रूप में किया. बिना स्वार्थ भरे उद्देश्य के कर्तव्यभाव से किया गया कर्म भगवान की पूजा होता है क्योंकि वह विश्व को चलाने में भगवान की मदद करता है.

महात्मा गांधी एक सच्चे कर्मयोगी थे, जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए, समाज की भलाई-मात्र के लिए सारे जीवन निःस्वार्थ भाव से काम किया. उन्होंने विश्व के अन्य नेताओं के अनुकरण करने के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया. इस प्रकार के निःस्वार्थ व्यक्तियों के अनेक अन्य उदाहरण हैं.

जय : क्या हमारे नेताओं को इसी तरह काम करना चाहिये?

दादी मां : हां, एक सच्चा कर्मयोगी अपने व्यक्तिगत उदाहरण से हमें दिखाता है कि किस प्रकार कर्मयोग के मार्ग पर चलकर निःस्वार्थ जीवन जिया जाये और भगवान की प्राप्ति भी की जाये.

जय : यदि मैं कर्मयोगी बनना चाहूं, तो मुझे क्या करना होगा?

दादी मां : कर्मयोग के लिए निःस्वार्थ भाव से, अपने कर्म के फलों के प्रति मोह के बिना शक्तिभर अपने कर्तव्य का पालन ज़रूरी है. कर्मयोगी सफलता और विफलता दोनों में शान्त रहता है, उसकी किसी व्यक्ति, स्थान, पदार्थ अथवा काम के प्रति रुचि या अरुचि नहीं होती. मानवता की भलाई के लिए निःस्वार्थ सेवा के रूप में किया गया कर्म किसी प्रकार का अच्छा या बुरा कर्मबन्धन पैदा नहीं करता और भगवान की ओर ले जाता है. (गीता 3.19)

जय : किसी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के बिना काम करना तो बहुत कठिन होगा. दादी मां, हम ऐसा किस प्रकार कर सकते हैं?

दादी मां : जो लोग आध्यात्मिक दृष्टि से अज्ञानी हैं, वे अपने लिए ही काम करते हैं. अज्ञानी लोग अपने परिश्रम के फल का सुख भोगने के लिए काम करते हैं और उसके प्रति उनका मोह हो जाता है क्योंकि वे समझते हैं कि वे ही कर्ता हैं. उन्हें इस बात का आभास नहीं होता कि सारा कर्म भगवान के द्वारा हमें दी गई शक्ति के द्वारा ही किया जाता है (गीता 3.27). पर अपनी बुद्धि से सही या गलत कर्म के बीच में चुनाव करके हम अपने कर्मों के भागी हो जाते हैं. लोग गलत काम करते हैं. क्योंकि वे अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करते और यह नहीं सोचते कि उनके कर्मों का दूसरों पर क्या असर होगा.

ज्ञानी लोग अपनी कोई भी स्वार्थपूर्ण इच्छा न रखते हुए अपने सारे कर्म तथा कर्मफल भगवान को अर्पण कर देते हैं. अज्ञानी जन केवल अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही कर्म करते (गीता 3.25).

जय : क्या मेरे जैसा साधारण व्यक्ति वह कर सकता है जो राजा जनक और महात्मा गांधी जैसे महान पुरुषों ने किया?

दादी मां : थोड़े से प्रयास से कोई भी व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग का अनुसरण कर सकता है. जो भी काम तुम कर रहे हो, उसे समाज को अपनी भेंट समझो. यदि तुम एक विद्यार्थी हो, तो तुम्हारा कर्तव्य है स्कूल जाना, वहां से मिले काम को घर पर करना, अपने मातापिता, अध्यापक और अन्य गुरुजनों का सम्मान करना और अपने भाईबहिनों, मित्रों तथा सहपाठियों की सहायता करना. विद्यार्थी काल में अच्छी शिक्षा पाकर अच्छे और लाभदायक नागरिक बनने की तैयारी करो.

जय : शिक्षा समाप्त कर मुझे किस प्रकार का काम करना चाहिये, दादी मां.

दादी मां : वही काम करो, जो तुम्हें पसन्द है और जिसे तुम अच्छी तरह कर सकते हो. काम तुम्हारी प्रकृति के अनुकूल होना चाहिये (गीता 3.35, 18.47). यदि तुम ऐसा काम चुनते हो, जिसमें तुम्हारा मन नहीं लगता है या जिसके लिए तुम्हारे पास स्वाभाविक योग्यता नहीं है, तो तुम्हारी सफलता के अवसर सीमित होंगे. तुम्हें मालूम है कि कौन सा काम तुम सबसे अच्छी तरह कर सकते हो. वह होने का प्रयत्न करना जो तुम नहीं हो असफलता और दुःख का सबसे बड़ा कारण है.

जय : पर क्या मुझे अच्छा काम ढ़ूंढ़ने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये, जैसे इंजीनियरींग, अध्यापन या सरकारी नौकरी?

दादी मां : ऐसा कोई काम नहीं जो अच्छा हो या बुरा. समाज को चलाने के लिए सब प्रकार के लोगों की ज़रूरत है. कुछ काम करने से अच्छी आमदनी होती है. पर ऊंची आय वाले काम प्रायः अधिक कठिन और तनाव भरे होते हैं, यदि उन्हें करने की योग्यता तुममें नहीं है. यदि तुम्हारी योग्यता कम आय वाले काम के लिए है, तो सादा जीवन बिताओ और अनावश्यक चीज़ों से बचो. सादे जीवन का अर्थ है अत्यधिक भौतिक पदार्थों की इच्छा न करना. जीवन की परम आवश्यकताओं तक अपने को सीमित करो. अपनी इच्छाओं पर काबू पाओ. भगवान बुद्ध ने कहा हैः स्वार्थभरी इच्छा सभी पापों और दुःख का कारण है.

जय : क्या स्वार्थपूर्ण इच्छाओं के कारण ही लोग बुरे काम करते हैं?

दादी मां : हां, जय. अपने सुख के लिए स्वार्थपूर्ण इच्छा ही सब पापों का कारण है. यदि हम अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण नहीं रखते, तो हमारी इच्छाएं हम पर छा जायेंगी. हम अपनी ही इच्छाओं के शिकार हो जायेंगे. अपनी ज़रूरतों पर अंकुश रखो, क्योंकि जिसकी तुम्हें इच्छा है, वह इच्छा भी तुमको अपने वश में करना चाहती है.

जय : तो क्या सभी इच्छाएं बुरी हैं?

दादी मां : नहीं, सब इच्छाएं बुरी नहीं हैं. दूसरों की सेवा करने की इच्छा अच्छी है. भोगों के आनन्द की इच्छा बुरी है क्योंकि वह पापपूर्ण और गैर कानूनी क्रियाओं की ओर ले जाती है और लोभ पैदा करती है. और यदि जो तुम चाहते हो, वह नहीं मिलता, तो तुम्हें क्रोध आता है. और जब लोगों को क्रोध आता है, तो वे दुष्कर्म करते हैं.

जय : भोगों के प्रति अपनी इच्छा पर हम कैसे काबू पा सकते हैं?

दादी मां : एक रास्ता तो गीता में दिये ज्ञान का चिन्तन (विचार) करने का है. इससे पहले कि तुम अपनी इच्छा से उत्पन्न काम करो, उस काम के परिणामों को सोचो. इच्छाएं मन में पैदा होती हैं और वहीं रहती हैं. बुद्धि और तर्कशक्ति के द्वारा तुम मन को वश में कर सकते हो.

जब तुम युवा होते हो, तुम्हारा मन गंदा हो जाता है, वैसे ही जैसे बरसात में तालाब का पानी कीचड़भरा हो जाता है. यदि तुम्हारी बुद्धि तुम्हारे मन को काबू में नहीं रखती, तो तुम्हारा मन इन्द्रियसुखभोगों की ओर भागता है. इसलिये धूम्रपान, शराब, नशीले पदार्थ और अन्य बुरी आदतों जैसे इन्द्रियसुखभोगों से अपने मन को गंदा न होने के लिए अपने जीवन में कोई ऊंचा आदर्श पैदा करो. बुरी आदतों से छुटकारा पाना कठिन है, इसलिये शुरू से ही उन आदतों से बचो. अच्छी संगति में रहो, अच्छी किताबें पढ़ो, बुरे लोगों की संगति से बचो और अपने कामों के परिणाम के बारे में सोचो.

जय : चूंकि हमें अच्छेबुरे का ज्ञान है, दादी मां, तो हम गलत कामों को करने से बच क्यों नहीं सकते?

दादी मां : यदि हम अपने मन को काबू में नहीं रखते, तो हमारा मन हमारी इच्छाशक्ति को कमज़ोर करने की कोशिश करेगा और हमें इन्द्रियसुखभोगों की ओर ले जायेगा. हमें अपने मन पर निगरानी रखनी पड़ेगी और उसे सही मार्ग पर रखना पड़ेगा.

अध्याय 3 का सार भगवान कृष्ण जीवन में शान्ति और सुख पाने के लिए गीता में दो प्रमुख मार्गों का वर्णन करते हैं. मार्ग का चुनाव व्यक्ति पर निर्भर करता है. अधिकांश लोगों के लिए कर्मयोग (निःस्वार्थ सेवा) का मार्ग पर चलना सहज है. ब्रह्मा की पहली शिक्षा हैः एकदूसरे की सहायता करो. इसी से संसार चल रहा है (गीता 3.11). अपनी योग्यता के अनुसार हमें अपने कर्तव्य का पूरा पालन करना चाहिये. अपनी प्रकृति के अनुसार हमें अपना काम चुनना चाहिये कोई काम छोटा नहीं है. महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि तुम क्या करते हो, बल्कि यह है कि कैसे करते हो. अन्त में भगवान कृष्ण हमें बताते हैं कि हमें भोगों की ओर ले जाने वाली अपनी इच्छा पर काबू पाना चाहिये. सुखभोग की ओर ले जाने वाली अनियंत्रित इच्छाएं हमें जीवन में असफलताओं और दुःखों की ओर ले जाती हैं. काम करने से पहले हमें उसके परिणामों के बारे में सोचना चाहिये. हर प्रकार से हमें कुसंगति से बचना चाहिये.

 

अध्याय चार

ज्ञानसंन्यासमार्ग

जय : गीता में युद्धक्षेत्र में बोले हुए कथन का विवरण है. पर दादी मां, गीता को लिखा किसने था?

दादी मां : गीता की शिक्षाएं बहुत पुरानी हैं. सबसे पहले वे सृष्टि के आरम्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने सूर्यदेवता को दी थीं. बाद में वे खो गईं. वर्तमान में जो गीता का स्वरूप है, वह लगभग 5,100 वर्ष पहले भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई शिक्षा है.

जयः तो क्या भगवान कृष्ण ही गीता के लेखक हैं?

दादी मां : हां, भगवान कृष्ण गीता को बोलने वाले हैं. लेकिन ऋषि व्यास ने इसे इकट्ठा किया है. उन्होंने ही वेदों को भी इकट्ठा किया. ऋषि व्यास में भूतकाल और भविष्य की घटनाओं को याद करने की शक्ति थी. किन्तु वे एक साथ ही भगवान कृष्ण द्वारा युद्धक्षेत्र में कही गई गीता को फिर से याद करके नहीं लिख नहीं सकते थे. उन्हें गीता को लिखने के लिए एक सहायक की ज़रूरत थी. ज्ञान-विवेक के देवता श्री गणेश जी ने गीता को लिखा.

आदि गुरु शंकराचार्य ने 800 ईसा संवत् में गीता को संस्कृत में पूरी तरह से समझाया.

जयः श्रीकृष्ण इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?

दादी मांः भगवान कृष्ण परमात्मा के आठवें अवतार माने जाते हैं. परमात्मा इस धरती पर समयसमय पर विभिन्न रूपों में अवतरित होते हैं, जब अधर्म और पाप की शक्तियां विश्वशान्ति को भंग करके विनाश का प्रयत्न करती हैं. भगवान तब सब चीज़ों को ठीक करने के लिए अवतार लेते हैं. वे मानवजाति की मदद के लिए मसीहों और शिक्षकों को भी भेजते हैं. भगवान का जन्म और कर्म दैवी होते हैं और हर अवतार का एक उद्देश्य होता है. श्रीमद् भागवतम् (अथवा भागवत महापुराण) में भगवान के सभी दस अवतारों का विवरण है. भगवान बुद्ध, मूसा, ईसा, मुहम्मद और अन्य ऋषिसन्त भी भगवान के छोटेमोटे अवतार माने जाते हैं. कलियुग के नाम से जाने जाने वाले वर्तमान समय के अन्त में कल्कि का अवतार होगा.

जयः क्या भगवान कृष्ण हमें वह सब देंगे, जो हम प्रार्थना या पूजा में चाहेंगे?

दादी मां : हां, भगवान कृष्ण वह देंगे, जो तुम चाहोगे (गीता 4.11), जैसे तुम्हारे अध्ययन में सफलता, यदि तुम निष्ठा और विश्वास के साथ उनकी पूजा करोगे. लोग भगवान की पूजा और प्रार्थना भगवान के किसी भी रूप और नाम का प्रयोग करते हुए कर सकते हैं. भगवान के रूप को देवमूर्ति कहा गया है. लोग बिना देवमूर्ति की सहायता के भी भगवान की पूजा कर सकते हैं.

जय : पर क्या हमें तब भी पढ़ाई करनी पड़ेगी, यदि हम परीक्षाओं में अच्छी सफलता चाहते हैं?

दादी मां : हां, तुम्हें परिश्रम तो करना ही चाहिये. शक्तिभर काम करो और फिर प्रार्थना. भगवान तुम्हारे लिए परिश्रम नहीं करेंगे. तुम्हें अपना काम स्वयं ही करना पड़ेगा. तुम्हारा काम स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से मुक्त होना चाहिये और तुम्हें किसी को हानि नहीं पहुंचानी चाहिये. तब तुम्हें कर्म का कोई बन्धन नहीं होगा.

जय : कर्म क्या है, दादी मां?

दादी मां : कर्म संस्कृत का शब्द है. इसका अर्थ है काम या क्रिया. इसका अर्थ काम का फल या परिणाम भी है. हर काम का एक फल होता है, उसे भी कर्म कहते हैं. वह अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी. यदि हम फलों को केवल स्वयं भोगने के लिए ही अपना काम करते हैं, तो हम उन फलों के लिए जिम्मेवार हैं. यदि हमारे काम से किसी को हानि पहुंचती है, तो हम बुरे कर्म कमाते हैं. उसे पाप कहा जाता है. उसके लिए हमें नरक का दुःख भोगना पड़ेगा. यदि हम दूसरों का भला करते हैं, तो हम अच्छे कर्म कमाते हैं और उसका पुरस्कार हमें स्वर्ग की यात्रा के रूप में मिलता है.

हमारे अपने ही कामों के परिणामों के कारण सुख या दुःख भोगने के लिए हमारा पुनर्जन्म होता है. कर्म अच्छे या बुरे कामों के रूप में बैंक में धन जमा करने की तरह है. जब हमारे कर्म पूरे समाप्त हो जाते हैं, तो हम पुनर्जन्म नहीं लेते. जन्ममरण के चक्र से छुटकारा पाने को ही मोक्ष कहा गया है. उसी को निर्वाण या मुक्ति भी कहते हैं. मुक्ति में हम भगवान के साथ एक हो जाते हैं.

जय : समाज में रहकर काम करते हुए हम कर्म से कैसे बच सकते हैं?

दादी मां : कर्म न कमाने का सबसे अच्छा रास्ता है-- केवल अपने लिए ही कुछ न करना, जो करना, समाज की भलाई के लिए करना. सदा इस बात का सदा ध्यान रखो कि प्रकृति मां ही सब कुछ करती है, हम किसी भी काम के वास्तविक कर्ता नहीं हैं. यदि हमें इस बात में दृढ़ विश्वास है और हम भगवान के सेवक के रूप में काम करते हैं, तो हम कोई नये कर्म नहीं कमायेंगे और आत्मज्ञान से हमारे सब पुराने कर्म मिट जायेंगे. कर्म के समाप्त हो जाने पर हम मुक्त हो जाते हैं. भगवान के साथ मिल जाने का यह ढ़ंग निष्काम कर्म या कर्मयोग का मार्ग कहलाता है.

जय : अपने पिछले जन्मों के कर्म से हमें कैसे छुटकारा मिलता है?

दादी मां : बहुत अच्छा प्रश्न पूछा तुमने. आत्मा (अथवा परमात्मा) का सच्चा ज्ञान आग की तरह काम करता है. हमारे पिछले जन्मों के सभी कर्म को जला देता है (गीता 4.37). निष्काम (निःस्वार्थ सेवा) या कर्मयोग आत्मज्ञान पाने के लिए व्यक्ति को तैयार करता है. समय आने पर कर्मयोगी स्वयं ही आत्मज्ञान पा लेता है (गीता 4.38). जिसे आत्मा (या परमात्मा) का ज्ञान सही रूप में मिल जाता है, वह आत्मज्ञानी कहलाता है.

जय : दादी मां, क्या मोक्ष पाने के लिए और भी मार्ग हैं?

दादी मां : हां, जय, प्रभु तक पहुंचने के अनेक मार्ग हैं. उन मार्गों को साधना कहा जाता है. समाज के लिए लाभकारी कोई भी कर्म यज्ञ कहा जाता है. अलगअलग तरह की साधना ये हैं

(1) अच्छे काम के लिए दिया गया दान, (2) ध्यान, पूजा पाठ (3) योगाभ्यास, (4) धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन (स्वाध्याय), और (5) मन तथा अन्य पांच इन्द्रियों पर नियंत्रण. (गीता 4.28)

जो भी व्यक्ति इन में से कोई भी साधना निष्ठा से (श्रद्धापूर्वक) करते हैं, प्रभु उनसे प्रसन्न होते हैं और उसे परमात्मा तक पहुंचने के लिए आत्मज्ञान का दान देते हैं. ऐसा व्यक्ति सुखी और शान्त होता है. (गीता 4.39)

जय : उनके बारे में आपका क्या विचार है जो रोज़ किसी दैवी मूर्ति की उपासना (पूजा) करते हैं? क्या उन्हें भी परमात्मा की प्राप्ति होती है?

दादी मां : हां, जो पूरे विश्वास से दैवी मूर्ति की उपासना करते हैं, उन्हें भी मनवांछित फल प्राप्त होता है (गीता 4.1112). अधिकांश हिन्दू अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की पूजा अपनी चुनी हुई एक दैवी मूर्ति के रूप में करते हैं. यह मार्ग पूजा या प्रार्थना का मार्ग कहलाता है. महाभारत में एक निष्ठ कर्मयोगी और आदर्श विद्यार्थी की कथा है, जिसने अपने गुरु की पूजा करके मनचाहा फल प्राप्त किया.

4 . एकलव्य. एक आदर्श छात्र

गुरु द्रोणाचार्य (या द्रोण) पितामह भीष्म द्वारा नियुक्त सभी कौरवों और पाण्डव भाइयों को शस्त्रविद्या सिखाने वाले गुरु थे. उनके नीचे अन्य राजकुमारों ने भी शस्त्रविद्या की शिक्षा पाई थी. द्रोण अर्जुन की व्यक्तिगत सेवा और भक्ति से लिए बहुत प्रसन्न थे. उन्होंने अर्जुन से वायदा किया था, मैं तुम्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना दूंगा.

एक दिन एक बहुत ही सुशील लड़का, जिसका नाम एकलव्य था, निकट के एक गांव से द्रोण के पास आया. वह उनसे धनुर्विद्या की शिक्षा पाना चाहता था. उसने अपनी मां से महान धनुर्शास्त्री द्रोणाचार्य के बारे में सुना था, जो ऋषि भारद्वाज के पुत्र और परशुराम ऋषि के शिष्य थे.

एकलव्य निषाद समाज का एक वनवासी लड़का था. उस युग में (और आज भी) ऐसे समुदाय सामाजिक दृष्टि से निम्न समझे जाते थे. द्रोण इस बात के प्रति चिन्तित थे कि वे राजकुमारों के साथ एक वनवासी लड़के को कैसे शिक्षा दें. इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि वे उसे वहां नहीं रखेंगे. उन्होंने उससे कहा, बेटे, मेरे लिए तुम्हें शिक्षा देना बहुत कठिन होगा. पर तुम एक जन्मजात धनुर्धर हो. वन में जाओ और मन लगाकर अभ्यास करो. तुम भी मेरे शिष्य हो. भगवान करे, तुम अपनी इच्छा के अनुकूल सफल धनुर्धर बनो.

द्रोण के शब्द एकलव्य के लिए महान आशीर्वाद थे. उसने उनकी विवशता समझी और उसे पूरा विश्वास था कि गुरु की सद्भावनाएं उसके साथ थीं. उसने द्रोणाचार्य की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई, उसे एक अच्छे स्थान पर प्रतिष्ठित किया और आदर के साथ फलफूल आदि की भेंट के साथ उनकी पूजा करना शुरू कर दिया. उसने अपने गुरु की प्रतिमा की प्रतिदिन उपासना की और गुरु की अनुपस्थिति में धनुर्विद्या का अभ्यास किया. वह धनुर्विद्या में निपुण हो गया.

एकलव्य रोज़ सुबह उठता, नहाता और गुरु की प्रतिमा की पूजा करता. उसे गुरु के शब्द, कर्म और शिक्षा के तरीकों में बेहद निष्ठा थी, जो उसने द्रोण के आश्रम में देखेसुने थे. उसने निष्ठापूर्वक गुरु के निर्देशों का पालन किया और धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा.

जहां एक ओर अर्जुन ने प्रत्यक्ष गुरु द्रोण से शिक्षा पाकर धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त की, वहीं एकलव्य ने उसी के समान प्रभावशाली योग्यता दूर रहकर गुरु की पूजा करके पाई. यदि वह किसी विशेष तकनीक में सफल न होता, तो वह गुरु द्रोण की प्रतिमा के पास दौड़ता, उसके सामने अपनी समस्या रखता, ध्यानमग्न होकर अपने मस्तिष्क में हल पाने तक प्रतीक्षा करता और आगे अभ्यास करता.

एकलव्य की कथा सिद्ध करती है कि यदि किसी में पूरा विश्वास है और वह निष्ठापूर्वक अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए काम करता है, तो वह कुछ भी पा सकता है (गीता 17.03).

कौरव और पाण्डव राजकुमार एक बार वन में शिकार खेलने के लिए गये. उनका निर्देशक कुत्ता उनके आगेआगे भाग रहा था. श्यामवर्ण का युवक शेर की खाल पहने, सीपियों की माला पहने एकलव्य अपने अभ्यास में लगा था. उसके पास आने पर कुत्ता भौंकने लगा. शायद अपनी निपुणता दर्शाने के लिए एकलव्य ने सात बाण एकएक कर भौंकते हुए कुत्ते की ओर चलाये. उसके बाणों से कुत्ते का मुंह भर गया. कुत्ता वापिस राजकुमारों के पास भागा आया, जिन्हें धनुर्विद्या की ऐसी निपुणता देखकर बहुत आश्चर्य हुआ. वे सोचने लगे, ऐसा धनुर्धर कौन हो सकता है?

अर्जुन यह देखकर न केवल आश्चर्य चकित हो गया, वरन् वह चिन्ता से भी भर गया. उसकी कामना थी कि वह विश्वभर में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के रूप में जाना जाये.

राजकुमार धनुर्धर की खोज में गये, जिसने इतने कम समय में उनके कुत्ते पर इतने बाण चलाये. उन्हें एकलव्य मिल गया.

अर्जुन ने कहा, धनुर्विद्या में तुम्हें महान योग्यता मिली है, तुम्हारा गुरु कौन है?

मेरे गुरु द्रोणाचार्य हैं, एकलव्य ने विनम्रता से उत्तर दिया.

द्रोण का नाम सुनकर अर्जुन को बड़ा धक्का लगा. क्या यह सच था? क्या उसके प्रिय गुरु इस लड़के को इतना सिखा सकते थे? यदि ऐसा था, तो उसको दिये हुए गुरु के वायदे का क्या हुआ? द्रोण ने लड़के को कब शिक्षा दी? अर्जुन ने तो एकलव्य को कभी पहले अपनी कक्षा में देखा न था.

जब द्रोण ने यह कहानी सुनी, तो उन्हें एकलव्य याद आया. वे उससे मिलने गये.

द्रोण ने कहा, बेटे, तुम्हारा शिक्षण बहुत अच्छा हुआ है. मुझे बहुत सन्तोष है. श्रद्धा और अभ्यास से तुमने बहुत प्रगति की है. प्रभु करे, तुम्हारी उपलब्धि दूसरों के लिए अच्छा उदाहरण सिद्ध हो.

एकलव्य ने बहुत प्रसन्न होकर कहा, बहुतबहुत धन्यवाद, गुरुदेव. आप मेरे गुरु हैं और मैं आपका ही शिष्य हूं, नहीं तो मैं नहीं जानता मैं इतनी प्रगति कैसे कर पाता.

द्रोण ने कहा, यदि तुम मुझे अपना गुरु स्वीकार करते हो, तो तुम्हें प्रशिक्षण के बाद मुझे गुरुदक्षिणा देनी पड़ेगी. फिर से सोच लो.

एकलव्य ने मुस्कराकर कहा, श्रीमन्, इसमें सोचने की क्या बात है? मैं आपका शिष्य हूं और आप मेरे गुरु हैं. श्रीमन् आपकी जो इच्छा है, कहिये. मैं उसकी पूर्ति करूंगा, चाहे उस प्रयत्न में मुझे अपना जीवन भी समर्पित करना पड़े.

एकलव्य, मुझे भीष्म और अर्जुन को दिये अपने वचन को पूरा करने के लिए तुमसे महानतम त्याग की मांग करनी पड़ेगी. मैंने उन्हें वचन दिया है कि अर्जुन के समान विश्व में कभी कोई धनुर्धर नहीं होगा. उसके लिए बेटे, मुझे क्षमा करना, क्या तुम मुझे अपने दायें हाथ का अंगूठा दक्षिणा में दे सकते हो?

एकलव्य ने द्रोणाचार्य की ओर देखा--पल भर के लिए. वह गुरु की समस्या समझ सकता था. तब वह खड़ा हुआ. दृढ़ निश्चय के साथ वह द्रोण की प्रतिमा की ओर गया. उसने एक शिला पर अपना दाहिना अंगूठा रखा और क्षण भर में बायें हाथ से बाण चलाकर उसे काट डाला.

एकलव्य को पहुंचाई वेदना के प्रति अत्यन्त दुःखी होते हुए भी द्रोण इतनी महान श्रद्धा से बहुत भावुक हो उठे. उन्होंने एकलव्य को गले लगाया और कहा, बेटे, तुम्हारे जैसी गुरुश्रद्धा का कोई उदाहरण नहीं. तुम्हारे जैसा शिष्य पाकर मैं अपने को सफल और धन्य अनुभव करता हूं. प्रभु का वरद हस्त तुम पर रहे.

हार में भी एकलव्य ने विजय पाई. दाएं अंगूठे के कट जाने से वह अब धनुष का प्रयोग प्रभावी ढ़ंग से नहीं कर सकता था, किन्तु वह बाएं हाथ से अभ्यास करता रहा. अपने महान त्याग के कारण वह प्रभु की कृपा का पात्र बना और वामहस्तधनुर्धर के रूप में विशेष योग्यता पाई. उसने सिद्ध कर दिया कि निष्ठ प्रयास से कुछ भी ऐसा नहीं, जो पाया न जा सके. एकलव्य ने अपने कर्म और व्यवहार से यह दिखा दिया कि समाज में तुम्हारा स्थान ऊंचा या नीचा तुम्हारी जाति से नहीं बनता, बल्कि बनता है तुम्हारे स्वप्न और गुणों से.

द्रोण महान गुरु थे, जय. पर बहुत से नकली गुरु हैं, जो तुम्हें धोखा देने का प्रयत्न करते हैं.

जय : प्रभु की प्राप्ति के लिए गुरु ज़रूरी है क्या, दादी मां?

दादी मां : किसी भी विषय की शिक्षा पाने के लिए, चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक, निश्चय ही हमें गुरु की ज़रूरत होती है. किन्तु असली गुरु का मिलना इतना आसान नहीं है. गुरु चार प्रकार के होते हैं : अपने विषय का ज्ञान रखने वाला गुरु, नकली गुरु, सद्गुरु और परम गुरु. दुनिया में बहुत से नकली गुरु हैं, जो गुरु होने का ढ़ोंग रचते हैं. सद्गुरु प्रभुज्ञानी गुरु है और उसकी खोज बहुत कठिन है. भगवान कृष्ण को जगद्गुरु या परमगुरु कहा जाता है.

कालिज की पढ़ाई समाप्त करने पर जब तुम गृहस्थ जीवन में प्रवेश करोगे, तो तुम्हें आध्यात्मिक गुरु की ज़रूरत होगी. तब तक अपने शास्त्रग्रन्थों का अनुसरण करो, अपनी संस्कृति के अनुसार चलो और जीवन में कभी भी हार न मानो.

अध्याय चार का सार समयसमय पर पृथिवी पर चीज़ों को ठीक करने के लिए प्रभु जीव रूप में पृथिवी पर आते हैं. वे उनकी इच्छाएं पूरी करते हैं, जो उनकी उपासना करते हैं. निष्काम (निःस्वार्थ) सेवा और आत्मज्ञान दोनों ही जीवात्मा को कर्मबन्धन से मुक्त करते हैं. प्रभु निःस्वार्थ सेवा करने वाले लोगों को आत्मज्ञान देते हैं. आत्मज्ञान से हमारे सब पिछले कर्म भस्म होते हैं. आत्मज्ञान हमें जन्ममरण के चक्र से मुक्ति दिलाता है.

 

अध्याय पांच

कर्मसंन्यास मार्ग

जय : आपने पहले दो मार्गों की चर्चा की दादी मां, अधिकांश लोगों के लिए कौनसा मार्ग अच्छा है? आत्मज्ञान का या निःस्वार्थ सेवा का?

दादी मां : वह व्यक्ति, जिसे परमात्मा का सही ज्ञान होता है, जानता है कि सारे कार्य प्रकृति मां की शक्ति से किये जाते हैं और वह किसी कार्य का वास्तविक कर्ता नहीं है. ऐसे व्यक्ति को संन्यासी कहा जाता है. वही आत्मज्ञानी है.

कर्मयोगी व्यक्ति स्वार्थ भरे उद्देश्यों से ऊपर उठकर कर्म करता है. कर्मयोगी आत्मज्ञान पाने की तैयारी करता है (गीता 4.38, 5.06). आत्मज्ञान संन्यास की ओर ले जाता है. इस प्रकार निष्काम सेवा या कर्मयोग, संन्यास का आधार बनता है. दोनों ही मार्ग अन्त में प्रभु की ओर ले जाते हैं. भगवान कृष्ण इन दोनों मार्गों में से कर्मयोग को बेहतर समझते हैं क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए यह मार्ग सरल है और इस पर आसानी से चला जा सकता है (गीता 5.02).

जय : क्या संन्यास शब्द का अर्थ प्रायः सांसारिक वस्तुओं का त्याग करना और आश्रम में रहना या एकान्त वास करना नहीं है?

दादी मां : साधारणतः संन्यास का अर्थ सब व्यक्तिगत ध्येयों का, सांसारिक वस्तुओं से आसक्ति का त्याग करना है. किन्तु इसका अर्थ समाज में रहकर व्यक्तिगत स्वार्थों के बिना अपने कर्तव्य का पालन करते हुए समाज की सेवा करना भी है. ऐसे व्यक्ति को कर्मसंन्यासी कहा जाता है.

आदि शंकराचार्य जैसे कुछ आध्यात्मिक गुरु सारी सांसारिक वस्तुओं के त्याग के मार्ग को उच्चतम मार्ग और जीवन का ध्येय मानते हैं. वे अपने लड़कपन में ही संन्यासी हो गये थे.

भगवान कृष्ण कहते हैं ज्ञानी सब स्वार्थों का त्यागी होता है. संन्यासी सब प्राणियों में भगवान को देखता है. ऐसा व्यक्ति शिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति को, धनी या निर्धन व्यक्ति को, यहां तक कि गाय, हाथी या कुत्ते को भी समान दृष्टि से देखता है (गीता 5.18).

मैं तुम्हें एक महान आध्यात्मिक गुरु, महानायक, संन्यासी और विचारक की कथा सुनाती हूं. उनका नाम है आदि शंकराचार्य. गीता के पाठकों के लिए वे महान आदर और सम्मान के पात्र हैं.

5 . आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य या शंकर वेदान्त के अद्वैतवाद दर्शन के रचयिता और प्रसारक हैं. इस दर्शन के अनुसार सारा विश्व ही ब्रह्म (परमात्मा) है, और कुछ नहीं. शंकर का जन्म 788 ईसवी में केरल राज्य में हुआ था. उन्होंने आठ वर्ष की उम्र में चारों वेदों का अध्ययन कर लिया था और बारह वर्ष की उम्र तक वे सब हिन्दू शास्त्रों में पारंगत हो गये थे.

उन्होंने कई ग्रन्थों की रचना की-- जिनमें भगवद्गीता, उपनिषदों और ब्रह्म सूत्र आदि अनेक ग्रन्थों के भाष्य शामिल हैं. शंकर द्वारा हमारे लिए अलग करने से पहले श्रीमद भगवद्गीता महाभारत में एक अध्याय के रूप में छिपी थी. शंकर ने गीता को महाभारत से निकालकर उसे शीर्षक देकर अध्यायों में व्यवस्थित किया और संस्कृत में पहला गीताभाष्य लिखा. गीता का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद एक ब्रिटिश शासक ने 19वीं शताब्दी में किया था.

शंकर ने भारत के विभिन्न कोनों में चार मठों की स्थापना की. वे श्रृंगेरी, बद्रीनाथ, द्वारका और पुरी में हैं. उन्होंने हिन्दू आदर्शों के विरोध में होते बौद्ध धर्म के प्रसार को रोका और हिन्दू धर्म को उसकी अतीत की महिमा से मंडित किया. उनके अद्वैत दर्शन के अनुसार जीवात्मा ही ब्रह्म है. संसार ब्रह्म की माया का खेल है.

निश्चय ही वे आत्मज्ञानी थे. किन्तु आरम्भ में उन्हें द्वैत की अनुभूति थी-- ऊंची और नीची जाति के रूप में. उनके हृदय में ब्रह्म में पूरी तरह दृढ़ विश्वास जड़ नहीं जमा पाया था.

एक दिन वे पावन नदी गंगा में स्नान कर बनारस की पावन नगरी में शिव मन्दिर जा रहे थे. उन्हें मांस का बोझ लिये एक कसाई, अछूत मिला. कसाई उनकी ओर आया और उनके सम्मान में उसने शंकर के चरण छूने का प्रयत्न किया.

शंकर क्रोध में भर कर चिल्लाये, मेरे मार्ग से हट जाओ. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की? अब मुझे फिर से स्नान करना होगा.

कसाई ने कहा, प्रभुवर, न मैंने आपको छुआ है, न आपने मुझे. शुद्ध आत्मा शरीर (या पंचतत्त्व जिनसे शरीर बना है) नहीं हो सकती. (अध्याय 13 में अधिक विवरण है)

तब शंकर को कसाई में भगवान शिव के दर्शन हुए. भगवान शिव स्वयं शंकर के हृदय में अद्वैत दर्शन का बीज गहराई से रोपने आये थे. भगवान शिव की कृपा से उस दिन से शंकराचार्य श्रेष्ठतर ज्ञानी बन गये.

यह कथा हमें बताती है कि हर समय सब जीवों के साथ समानता का व्यवहार करना बहुत ही कठिन है. ऐसी भावना का होना सच्चे ब्रह्मज्ञानी या पूर्ण संन्यासी होने का लक्षण है.

अध्याय पांच का सार भगवान कृष्ण अधिकांश लोगों के लिए फलों के प्रति मोह न रखते हुए मानवता की निःस्वार्थ-निष्काम सेवा के मार्ग को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं. आत्मज्ञान और सेवा. दोनों ही मार्ग इस लोक में सुख की ओर ले जाते हैं और मरने पर निर्वाण की ओर. संन्यास का अर्थ सांसारिक पदार्थों का त्याग नहीं है. संन्यास का अर्थ है सांसारिक पदार्थों के प्रति लगाव--मोह न होना. आत्मज्ञानी हर जीव में प्रभु के दर्शन करता है और सबके प्रति समान व्यवहार करता है.

 

अध्याय छः

ध्यान मार्ग

जय : दादी मां, आपने कहा था कि भगवान की प्राप्ति के लिए कई मार्ग हैं. आपने मुझे सेवाकर्तव्यमार्ग और आध्यात्मिक ज्ञानमार्ग के विषय में बताया. कृपया मुझे अन्य मार्गों के बारे में बतायें.

दादी मां : तीसरा मार्ग ध्यानयोग का है. जो भगवान के साथ मिलकर एकात्म होकर एक हो जाता है, उसे योगी कहते हैं. योगी का मन शान्त होता है और पूरी तरह प्रभु के साथ जुड़ा हुआ. योगी का अपने मन, इन्द्रियों और इच्छाओं पर पूरा नियंत्रण होता है. क्रोध और लोभ से वह पूरी तरह मुक्त होता है. योगी के लिए माटी का ढ़ेला, पत्थर, हीरा, सोना सब एक समान होता है (गीता 6.08). वह हर चीज़ में भगवान और भगवान में हर चीज़ को देखता है (गीता 14.24). योगी हर व्यक्ति को समान दृष्टि से देखता है, चाहे वह मित्र हो या शत्रु, घृणा करने वाला हो या सम्बन्धी, सन्त हो या पापी (गीता 6.09). बुरे से बुरे समय में भी योगी का मन शान्त रहता है (गीता 6.19).

जय : क्या बच्चों के लिए ध्यानयोग का कोई सरल सा उपाय है, दादी मां?

दादी मां : हां, है. मन ही तुम्हारा सबसे अच्छा मित्र है और मन ही सबसे बुरा शत्रु भी. मन उनके लिए मित्र है, जो इसे नियंत्रण में रखते हैं और उनके लिए शत्रु है जिनका नियंत्रण उस पर नहीं रहता (गीता 6.0506). इसलिए तुम्हें इस शत्रु को वश में करने का प्रयत्न करना चाहिये. मन हवा की भांति है, बहुत ही चंचल और नियंत्रण करने के लिए कठिन. किन्तु तुम नियमित रूप से ध्यानयोग का अभ्यास करके इसे वश में कर सकते हो (गीता 6.34). गुरु नानक ने कहा है मन को जीत लो, तो तुम सारे संसार को जीत लोगे.

ध्यानयोग का सरल उपाय

ध्यान के लिए सबसे अच्छा समय स्कूल जाने या सोने से पहले का है. अपने ध्यान या पूजा के कमरे में बैठ जाओ. अपनी छाती, रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा करो, निश्चल और दृढ़. अपनी आंखें बन्द करो और कुछ मंद, गहरी सांसें लो. अपनी प्रिय देवी-देवता का ध्यान करो और उनका आशीर्वाद मांगो. मन ही मन ओम् का पांच मिनट जाप करो. यदि तुम्हारा मन इधरउधर भागने लगे, तो उसे धीरे से अपने ईष्ट देवीदेवता पर वापिस लगाओ.

हमारे धर्मग्रन्थों में ध्रुव नाम के एक बालक की कथा है, जिसने ध्यानमार्ग द्वारा अपनी इच्छा पूरी की.

6 . ध्रुव की कथा

ध्रुव राजा उत्तानपाद और रानी सुनीति का बेटा था. राजा उत्तानपाद को अपनी दूसरी पत्नी सुरुचि से गहरा प्यार था. ध्रुव की मां सुनीति के प्रति उसका दुष्टता का व्यवहार था.

एक दिन जब ध्रुव पांच वर्ष का था, तो उसका सौतेला भाई उनके पिता की गोद में बैठा था. ध्रुव ने भी वहां बैठना चाहा. किंतु उसकी सौतेली मां ने उसे रोक दिया और घसीटकर एक ओर कर दिया.

वह बहुत ही बेरुखी से ध्रुव से बोली, यदि तुम्हें अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा थी, तो अपनी मां की जगह मेरी कोख से जन्म लिया होता. कम से कम अब भगवान विष्णु से प्रार्थना तो करो कि वह इस बात को सम्भव बनायें.

ध्रुव को अपनी सौतेली मां के अपमान भरे वचनों से बहुत गहरा दुःख पहुंचा. वह रोता हुआ अपनी मां के पास गया. उसकी मां ने उसे ढ़ांढ़स बंधाया और अपनी सौतेली मां की बात को गम्भीरता से लेकर भगवान विष्णु की उपासना करने को कहा, जो सब जीवों के सहायक हैं.

ध्रुव ने पिता का राज्य छोड़कर भगवान विष्णु के दर्शन करने के दृढ़ निश्चय के साथ वन की राह ली. वह ऊंचे स्थान पर जाना चाहता था. मार्ग में उसे नारद मुनि मिले. उन्होंने उसे भगवान कृष्ण के विष्णु रूप की पूजा करने के लिए बारह अक्षरों का मंत्र दिया, ओम् नमो भगवते वासुदेवाय. ध्रुव ने छः मास तक भगवान विष्णु की पूजा की. विष्णु भगवान ने उसे दर्शन दिये. भगवान विष्णु ने ध्रुव को वचन दिया कि ध्रुव की मनोकामना पूरी होगी और उसे ध्रुव तारा (Polar Star) के उच्चतम दैवी स्थान प्राप्त होगा.

ध्रुव राज्य में लौट गया. जब राजा बूढ़ा हो गया, तो उसने ध्रुव को राज्य देने का निर्णय किया. ध्रुव ने बहुत वर्षों तक राज्य किया और अन्त में भगवान विष्णु द्वारा वरदान पाकर ध्रुव नक्षत्र पहुंच गया. कहा गया है कि सारा आकाश मंडल नक्षत्र और तारों से बना है. सभी ध्रुव तारा के इर्दगिर्द घूमते हैं. आज तक, जब भी भारतीय लोग ध्रुव तारा को देखते हैं, तो पवित्र मनवाले दृढ़ निश्चयी भक्त ध्रुव को याद करते हैं.

जय : जो योगी इस जीवन में सफल नहीं होता, उसका क्या होता है?

दादी मां : योगी का किया हुआ कोई भी आध्यात्मिक अभ्यास कभी व्यर्थ नहीं जाता. असफल योगी का पुनर्जन्म आध्यात्मिक या धनी परिवार में होता है. वह उस ज्ञान को पुनः आसानी से प्राप्त कर लेता है--जो उसने पिछले जन्म में अर्जित किया था--और जहां उसने योग छोड़ा था वहीं से आगे चलकर वह पूर्णता प्राप्त करने का पुनः प्रयत्न करता है. कोई भी आध्यात्मिक प्रयास व्यर्थ नहीं जाता.

अध्याय छः का सार सर्वश्रेष्ठ योगी बनने के लिए सब जीवों को अपने जैसा देखो. दूसरों के सुखदुःख को अपना समझो. ध्यानयोग का बहुत सरल तरीका ओम् जाप के प्रयोग का है.

अध्याय सात

ज्ञानविज्ञान

जय : सारे विश्व का निर्माण कैसे हुआ, दादी मां? क्या उसका कोई बनाने वाला है?

दादी मां : किसी भी रचना (सृष्टि) के पीछे उसका कोई बनाने वाला (रचयिता या सृष्टा) होता है, जय. कोई भी चीज़ बिना किसी व्यक्ति या शक्ति के पैदा नहीं की जा सकती, नहीं बनाई जा सकती. न केवल उसकी सृष्टि के लिए, बल्कि उसके पालन करने और चलाने के लिए भी किसी न किसी शक्ति की ज़रूरत होती है. हम उस शक्ति को ही भगवान कहते हैं. परमप्रभु, परमात्मा, कृष्ण, ईश्वर, शिव कहते हैं. दूसरे धर्मों ने उसे अल्लाह, पिता, जहोवा, और अन्य नामों से पुकारा है. वास्तविक अर्थ में भगवान सृष्टि का सृष्टा नहीं है, बल्कि वह स्वयं ही विश्व में हर वस्तु का रूप धारण करके रहता है. वह ब्रह्मा के रूप में अवतरित होता है, जिसे हम सृष्टा कहते हैं. वास्तव में ब्रह्मा और अन्य सभी देवीदेवता केवल एक ही भगवान की भिन्नभिन्न शक्तियों के नाम हैं. लोग सोचते हैं कि हिन्दू बहुत से भगवान की पूजा करते हैं, पर उनका ऐसा सोचना सच्चे ज्ञान के अभाव के कारण है. सारा विश्व ही भगवान का रूप है. यही वेदान्त का उच्चतम दर्शन है, जिसे शायद तुम अभी पूरी तरह नहीं समझ सकते.

जय : एक भगवान विश्व में इतनी वस्तुएं कैसे बन जाता है?

दादी मां : सांख्य मत के अनुसार परमात्मा स्वयं पदार्थ का रूप धारण कर लेती है, जो पांच मूल तत्त्वों से बने हैं. सारी सृष्टि परमात्मा (या आत्मा) और पदार्थ (या प्रकृति). इन दो शक्तियों के मेल से उत्पन्न होती है (गीता 7.06). वही सूर्य और चन्द्रमा में प्रकाश के रूप में है. मानवों में वह मन और बल के रूप में है. वह हमारे भोजन को पचाती है और जीवन को सहारा देती है. उसी एक आत्मा के द्वारा हम सब एकदूसरे से जुड़े हैं, जैसे माला के सब फूल एक ही धागे से जुड़े होते हैं (गीता 7.07).

जय : यदि परमात्मा सब जगह है और सब चीज़ों में है, तो हर कोई उसे समझता क्यों नहीं, प्यार क्यों नहीं करता और उसकी पूजा क्यों नहीं करता?

दादी मां : बहुत अच्छा प्रश्न है यह, जय. प्रायः लोगों का परमात्मा के बारे में गलत विचार होता है, क्योंकि हर किसी को उसको समझने की शक्ति नहीं मिली है. जैसे कुछ लोग साधारण गणित भी नहीं समझ पाते, वैसे ही वे लोग, जिनके अच्छे कर्म नहीं है, परमात्मा को न जान सकते हैं, न समझ सकते हैं, न उसे प्यार कर सकते हैं और ना ही उसकी पूजा कर सकते हैं.

जय : तब वे कौन हैं, जो परमात्मा को समझ सकते हैं?

दादी मां : चार प्रकार के लोग हैं, जो परमात्मा की उपासना करते हैं या उसे समझने का प्रयास करते हैं. (1) वे जो रोगी हैं या किसी संकट में हैं या अपने अध्ययन या अन्य काम को भलीभांति करने में परमात्मा की सहायता चाहते हैं. (2) जो परमात्मा का ज्ञान पाने का प्रयत्न कर रहे हैं. (3) जिन्हें धन या पुत्र आदि किसी वस्तु की इच्छा है और (4) वे ज्ञानी, जिन्हें भगवान का ज्ञान है (गीता 7.16). भगवान कृष्ण चारों प्रकार के लोगों को भक्त मानते हैं. परन्तु ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह भगवान से बिना किसी चीज़ की इच्छा किये उनकी उपासना करता है. ऐसा ज्ञानी पुरुष भी भगवान को पूरी तरह कई जन्मों के बाद ही जान पाता है (गीता 7.19).

जय : यदि मैं कृष्ण की पूजा करूं, तो क्या मुझे परीक्षा में अच्छे मार्क मिल सकेंगे या मुझे रोग से मुक्ति मिल जायेगी?

दादी मां : हां. वे उन सबकी इच्छाएं पूरी करते हैं, जो उनमें विश्वास रखते हैं और पूरी आस्था के साथ सदा उनकी उपासना करते हैं. परमात्मा हमारी माता और हमारे पिता दोनों हैं. तुम्हें प्रभु से जो चाहिये, अपनी प्रार्थना में मांगना चाहिये. वे अपने निष्ठ भक्तों की इच्छाएं ज़रूर पूरी करते हैं (गीता 7.21).

जय : फिर हर कोई कृष्ण की पूजा क्यों नहीं करता? हम गणेश देवता, हनुमान, मां सरस्वती और कई और देवीदेवताओं की पूजा क्यों करते हैं?

दादी मां : भगवान कृष्ण परम प्रभु का नाम है. हिन्दू धर्म के कुछ सम्प्रदाय परम प्रभु को भगवान शिव भी कहते हैं. अन्य धर्मों के अनुयायी उसे बुद्ध, ईसा, अल्लाह, पिता आदि कहते हैं. अन्य देवीदेवता उसी की शक्ति के अंग हैं. जैसे वर्षा का सारा जल सागर को जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवीदेवता की पूजा कृष्ण अथवा परमात्मा को ही जाती है. किन्तु आरम्भ में व्यक्ति को अनेक में से किसी एक देवीदेवता को चुनकर पूजा के द्वारा उनसे व्यक्तिगत (personal) सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये या कम से कम अपने ईष्ट देव-देवी को नित्य नमस्कार करना चाहिये. वह व्यक्तिगत देव-देवी तब तुम्हारा व्यक्तिगत मार्गदर्शक और सहायक बन जाता है. व्यक्तिगत देवीदेव को ईष्टदेवी या ईष्टदेव भी कहते हैं.

जय : आपने कहा कि सारा विश्व परमात्मा का ही दूसरा रूप है. क्या भगवान निराकार है या भगवान कोई रूप धारण करता है?

दादी मां : यह बड़ा प्रश्न न केवल बच्चों में भ्रम पैदा करता है, बल्कि बड़ों के लिए भी समस्या है. इस प्रश्न के उत्तर के आधार पर हिन्दू धर्म में कई सम्प्रदाय या वर्ग पैदा हो गये हैं. एक सम्प्रदाय, जिसका नाम आर्यसमाज है, मानता है कि भगवान कोई रूप धारण नहीं कर सकता है और निराकार है, दूसरे वर्ग का विश्वास है कि भगवान रूप धारण करता है. उसका एक स्वरूप है. तीसरे वर्ग का विश्वास है वह निराकार है, और रूप भी धारण करता है. और एक वर्ग ऐसा भी है जो विश्वास करता है कि भगवान निराकार और साकार दोनों है.

मेरा विश्वास है कि हर चीज़ का एक रूप होता है. संसार में कुछ भी बिना रूप के नहीं है. प्रभु का भी एक ऐसा ही दिव्यरूप (Transcendental Form) है, जो हमारी इन आंखों से दिख नहीं सकता. उसे मानवीय मस्तिष्क से नहीं समझा जा सकता, ना ही शब्दों से उसका वर्णन किया जा सकता है. परमात्मा इन्द्रियातीत, विराट, अलौकिक रूप वाला है. उसका कोई आदि या अन्त नहीं है, किन्तु वह हर चीज़ का आदि और अन्त है. अदृश्य परमात्मा ही दृश्य जगत का कारण है. अदृश्य का अर्थ निराकार नहीं है. जो भी हम देखते हैं, वह परमात्मा का ही दूसरा रूप है. जैसा कि गीता 7.19 में कहा गया है. सब वस्तुओं में परमात्मा को देखने के व्यावहारिक रूप को समझाने के लिए एक कथा है.

7 . सब जीवों में प्रभु को देखें

एक वन में एक सन्त महात्मा रहते थे. उनके बहुत से शिष्य थे. उन्होंने अपने शिष्यों को सब जीवों में प्रभु को देखने की शिक्षा दी और सबको झुककर प्रणाम करने को कहा. एक बार उनका एक शिष्य जंगल में आग के लिए लकड़ी लेने गया. आचानक उसे एक चीख़ सुनाई दी.

रास्ते से हट जाओ. एक पागल हाथी आ रहा है.

महात्मा के एक शिष्य को छोड़कर सब लोग भाग खड़े हुए. परतू उसने हाथी को भगवान के ही एक अन्य रूप में देखा, तो क्यों भागता वह उससे? वह निश्चल खड़ा रहा. झुककर हाथी को प्रणाम किया. हाथी के रूप में भगवान का ध्यान करना शुरू कर दिया.

हाथी का महावत फिर चिल्लाया, भागो, भागो.

किन्तु शिष्य नहीं हिला. हाथी ने उसे अपनी सूंड से पकड़ा और एक तरफ फेंक कर अपने रास्ते पर चलता बना. शिष्य धरती पर बेहोश पड़ा रहा. इस घटना की बात सुनकर उसके गुरुभाई आये और उसे उठाकर आश्रम में ले गये. जड़ीबूटी की दवा से वह फिर होश में आ गया.

तब किसी न पूछा, जब तुम्हें पता था कि पागल हाथी आ रहा है, तो तुम उस जगह को छोड़कर भागे क्यों नहीं?

उसने उत्तर दिया, हमारे गुरु जी ने हमें सिखाया हे कि प्रभु सब जीवों में है, पशुओं में भी और मानवों में भी. अतः मैंने सोचा कि वह केवल हाथीदेवता ही था, जो आ रहा था. इसलिए मैं भागा नहीं.

इस पर गुरु ने कहा, हां, मेरे बच्चे, यह तो सच है कि हाथीदेवता आ रहा था, किन्तु महावतदेवता ने तो तुमसे रास्ते से हट जाने को कहा. तुमने महावत के शब्दों पर विश्वास क्यों नहीं क़िया? फिर हाथीदेवता को आत्मज्ञान नहीं था कि हम सब प्रभु हैं.

परमात्मा सब जीवों में रहता है. वह बाघ में भी है, पर हम बाघ को गले तो नहीं लगा सकते. केवल अच्छे लोगों के समीप रहो और पापात्माओं से दूर रहो. बुरे, पापी और दुर्जनों से दूर रहो.

 

8. अदृश्य

एक दिन एक छः वर्ष की लड़की कक्षा में बैठी थी. अध्यापक विकाससिद्धान्त को बच्चों को समझा रहा था.

अध्यापक ने एक छोटे बच्चे से पूछा, मानव, क्या तुम्हें बाहर एक पेड़ दिखाई देता है?

मानव हां.

अध्यापक बाहर जाओ और देखो कि तुम आकाश को देखते हो या नहीं.

मानव अच्छा. (कुछ मिनटों में लौटकर) हां, मैंने आकाश देखा.

अध्यापक तुमने कहीं परमात्मा को देखा?

मानव नहीं.

अध्यापक यही तो मैं कहता हूं. हम परमात्मा को नहीं देख सकते क्योंकि वह है ही नहीं. उसका अस्तित्त्व ही नहीं.

एक छोटी लड़की बोल उठी. वह लड़के से कुछ प्रश्न पूछना चाहती थी. अध्यापक ने अनुमति दे दी. छोटी लड़की ने लड़के से पूछा, मानव, तुमने बाहर पेड़ को देखा?

मानव हां.

छोटी लड़की मानव, तुम्हें बाहर घास दिखाई देती है?

मानव हांआं.

छोटी लड़की मानव, तुम अध्यापक को देखते हो?

मानव हां.

छोटी लड़की क्या तुम उनके मन या मस्तिष्क को देखते हो?

मानव नहीं.

छोटी लड़की फिर तो जो हमें आज स्कूल में पढ़ाया गया, उसके अनुसार उनके मन होगा ही नहीं.

परमात्मा हमारी भौतिक आंखों से नहीं देखा जा सकता. उसे केवल ज्ञान, आस्था और भक्ति की आंखों से देखा जा सकता है (गीता 7.2425). हम दृष्टि से नहीं, विश्वास से चलते हैं. वह हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है, उन्हें सुनता है.

अध्याय सात का सार परमात्मा एक ही है, जो अनेक नामों से पुकारा जाता है. हमारे धर्म में देवीदेवता या प्रतिमाएं उसी एक परम प्रभु की भिन्न शक्तियों के नाम हैं. देवीदेवता हमें पूजा और प्रार्थना में सहायता करने के लिए भिन्नभिन्न नाम और रूप हैं. सारी सृष्टि प्रकृति के पांच मूल तत्त्वों (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) और आत्मा से बनी है. परमात्मा निराकार भी है और साकार भी. वह कोई भी रूप धारण कर सकता है. बिना आध्यात्मिक ज्ञान के कोई परमात्मा को नहीं जान सकता.

अध्याय आठ

अक्षरब्रह्म

जय : दादी मां, मेरी आध्यात्मिक शब्दावली बहुत बड़ी नहीं है, इसलिए मैं बहुत से शब्दों को, जो मैं मन्दिर में सुनता हूं, समझ नहीं पाता. क्या उनमें से कुछ शब्दों को आप समझा सकती हैं?

दादी मां : मैं कुछ संस्कृत शब्दों को समझाऊंगी, तुम ध्यान से सुनो. इन शब्दों को शायद इस उम्र में पूरी तरह न समझ पाओ.

जो आत्मा सब जीवों के अन्दर रहता है, उसे संस्कृत में ब्रह्म कहते हैं. ब्रह्म (या आत्मा) न केवल सब जीवों का पोषण करता है, उनका आधार है, बल्कि सारे विश्व का भी आधार है, पालन कर्ता है. परमात्मा अनादि (जिसका शुरुआत नहीं है), अनन्त (जिसका अन्त नहीं है), शाश्वत (जो सदा रहता है) और अपरिवर्तनीय (जो कभी बदलता नहीं) है. अतः इसको अजर. अमर. अक्षरब्रह्म भी कहते हैं. ब्रह्म शब्द से प्रायः ब्रह्मा का भ्रम भी हो जाता है, जो सृष्टिकर्ता है विश्व का, क्रियात्मक ऊर्जा

शक्ति है. ब्रह्म को ब्रह्मन् भी कहते हैं. ब्रह्मन् शब्द से कभीकभी ब्राह्मण का भ्रम भी हो जाता है, जो भारत में एक ऊंची जाति का नाम है. ब्राह्मण शब्द को मैं आगे अध्याय 18 में समझाऊंगी.

परब्रह्म या परमात्मा को पिता, माता, परमप्रभु आदि भी कहते हैं जो सब चीज़ों का मूल है ब्रह्म या आत्मा का भी.

कर्म शब्द के कई अर्थ हैं. साधारणतः इसका अर्थ क्रिया है, जो हम करते हैं. इसका अर्थ पिछले जन्मों में किये गये कर्मों के जमा हुए फल, भी है.

ब्रह्म की विभिन्न शक्तियों को देव, देवी या देवता कहते हैं. हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इनकी पूजा करते हैं.

ईश्वर परमात्मा की वह शक्ति है, जो हर जीव के शरीर में रहकर जीव का मार्गदर्शन करती है और हम पर नियंत्रण (control) भी रखती है.

भगवान का सीधासादा अर्थ है शक्तिशाली. यह शब्द परमात्मा के लिए भी प्रयोग किया जाता है. श्रीकृष्ण को हम भगवान कृष्ण भी कहते हैं.

जीव या जीवात्मा वे जीवित प्राणी हैं, जो जन्म लेते हैं, सीमित आयु पाते हैं और मरते (या रूप बदलते) हैं.

जय : मुझे प्रभु की याद (स्मरण, ध्यान) और उपासना कितनी बार करनी चाहिये.

दादी मां : हमें खाने से पहले, सोने से पहले, प्रातःकाल उठने के बाद और काम या अध्ययन शुरू करने से पहले परमात्मा को याद करने की आदत डालनी चाहिये.

जय : क्या हम मृत्यु के बाद सदा मनुष्य के रूप में ही अगला जन्म लेते हैं?

दादी मां : मनुष्य पृथिवी पर पाई जाने वाली चौरासी लाख योनियों में से किसी भी योनि में मृत्यु के बाद फिर से जन्म ले सकता है. भगवान कृष्ण ने कहा है, मृत्यु के समय व्यक्ति जिसका भी स्मरण करता है, मृत्यु के बाद वही पाता है. मृत्यु के समय व्यक्ति वही याद करता है, जिसका विचार उसके जीवनकाल में ज्यादातर रहता है. (गीता 8.06). अतः मनुष्य को हर समय प्रभु का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये (गीता 8.07).

आत्मा के आवागमन को समझाने के लिए एक कथा है.

9 . राजा भरत की कथा

जब ऋषि विश्वामित्र अपने ही अलग विश्व की सृष्टि करने में व्यस्त थे, तो स्वर्ग के राजा इन्द्र को यह सहन न हुआ. तब इन्द्र ने स्वर्ग की सुन्दरी नर्तकी मेनका को उनके काम में विघ्न डालने को भेजा. मेनका अपने काम में सफल हो गई और विश्वामित्र ऋषि की एक पुत्री को उसने जन्म दिया, जिसका नाम शकुन्तला था. मेनका के उसे त्याग कर स्वर्ग चले जाने के बाद शकुन्तला का पालनपोषण कण्व ऋषि के आश्रम में हुआ.

एक दिन दुष्यन्त नाम के एक राजा ने कण्व ऋषि के आश्रम में प्रवेश किया. वहां वह शकुन्तला से मिला और उस पर मोहित हो गया. दुष्यन्त ने गुप्त रूप से आश्रम में शकुन्तला से विवाह कर लिया. कुछ समय के बाद शकुन्तला ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम भरत रखा गया. वह बहुत सुन्दर और बलशाली था, जो बचपन में भी किसी देवता का पुत्र लगता था. जब वह केवल छः वर्ष का था, तो वह बाघ, सिंह और हाथी जैसे जंगली जानवरों के बच्चों को बांधकर वन में खेला करता था.

दुष्यन्त की मृत्यु के बाद भरत राजा बना. भरत देश का सबसे महान राजा था. आज भी हम हिन्दुस्तान को भारतवर्ष या राजा भरत का देश के नाम से पुकारते हैं. राजा भरत के नौ बेटे थे, किन्तु उनमें से कोई भी ऐसा नहीं लगा जो उसके बाद राजा बनने के योग्य होता. इसलिए भरत ने एक योग्य बच्चे को गोद लिया, जिसने भरत के बाद राज्य संभाला. इस प्रकार राजा भरत ने प्रजातंत्र (Democracy) की नींव डाली.

भरत नाम के और भी कई शासक हुए हैं, जैसे भगवान राम के अनुज भरत और महाराजा भरत. महाराज भरत की एक कथा इस प्रकार है :

ऋषिराज ऋषभदेव के बेटे भगवान के भक्त महाराजा भरत ने भी हमारी सभी धरती पर शासन किया. उन्होंने बहुत समय तक राज्य किया, किन्तु अन्त में एक संन्यासी का आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए सब कुछ त्याग दिया. यद्यपि भरत महान राज्य का त्याग करने में समर्थ थे, किन्तु उन्हें एक शिशु हरिण के प्रति गहरा मोह पैदा हो गया. एक बार जब वह हरिण कहीं गायब हो गया, महाराजा भरत बहुत दुःखी हो गये और उसकी खोज करने लगे. हिरण की खोज करते हुए और उसकी अनुपस्थिति से शोक में डुबे महाराजा भरत गिर पड़े और मर गये. चूंकि मृत्यु के समय उनका मन पूरी तरह हिरण के ध्यान में डूबा हुआ था, उन्होंने एक हिरणी के गर्भ से अगला जन्म लिया.

यही है आत्मा के आवागमन (आने-जाने का चक्कर, Transmigration) का सिद्धान्त, जिसमें हमारा विश्वास है. कुछ पश्चिमी लोग भी पुनर्जन्म (Reincarnation) में विश्वास करते हैं. पुनर्जन्म का सिद्धान्त ऐसा मानता है कि मानवआत्मा मनुष्यों के ही रूप में पुनर्जन्म लेती है, पशुओं के रूप में नहीं. आवागमन का सिद्धान्त पुनर्जन्म के सिद्धान्त से अधिक व्यापक है.

जय : यदि प्राणी जन्म और मृत्यु के चक्र में लगे रहते हैं, तो सूरज, चांद, धरती और दूसरे नक्षत्रों की क्या गति है? क्या उनका भी जन्म और क्षय होता है?

दादी मां : सारी सृष्टि का अपना जीवनकाल होता है. जो संसार हमें दिखाई देता है. जैसे सूरज़ चांद, तारे आदि नक्षत्र और ग्रह, उनका जीवन काल 8.64 अरब वर्ष है. इस काल में सारे दिखाई देने वाले सृष्टि का विनाश होता है (गीता 8.1719). किन्तु ब्रह्म अविनाशी है, शाश्वत है. उसका कभी क्षय नहीं होता.

जय : यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद इस संसार में वापिस नहीं लौटते, तो उनका क्या होता है? क्या वे स्वर्ग जाते हैं और सदा वहीं रहते हैं?

दादी मां : जो मनुष्य इस धरती पर अच्छे कर्म करते हैं, वे स्वर्ग में जाते हैं, किन्तु स्वर्ग का सुख भोगकर उन्हें वापिस धरती पर आना पड़ता है (गीता 8.25, 9.21).

जो लोग दुर्जन और दुष्कर्मी रहे हैं, वे दण्डस्वरूप नरक में जाते हैं. वे भी धरती पर वापिस लौटते हैं. जिन मनुष्यों ने निर्वाण पा लिया है, वे फिर जन्म नहीं लेते. वे परमात्मा के साथ मिलकर एक हो जाते हैं और परमधाम को जाते हैं.

जय : हम परमधाम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

दादी मां : जिन्होंने परमात्मा का सच्चा ज्ञान पा लिया है, वे ब्रह्मज्ञानी कहलाते हैं और परमधाम को जाते हैं. उनका अगला जन्म नहीं होता. इसे मुक्ति कहा जाता है (गीता 8.24). मुक्ति उन अज्ञानी व्यक्तियों को नहीं मिलती जो अच्छे गुणो-- जैसे जप, तप, ध्यान, भगवान में विश्वास और ब्रह्मज्ञान आदि से वंचित हैं, जो ब्रह्मज्ञानी नहीं है, किन्तु जिन्होंने अच्छे कर्म किये हैं, वे अपने अच्छे कर्मों के कारण स्वर्ग जाते हैं और पुनः धरती पर जन्म लेते रहते हैं, जब तक वे पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लेते और आत्मज्ञानी नहीं बन जाते (गीता 8.25).

अध्याय आठ का सार इस अध्याय में कुछ संस्कृत शब्दों की व्याख्या की गई है, जो तुम बड़े होने पर अच्छी तरह समझ सकोगे. इसके साथ ही आवागमन और विश्व की सृष्टि और प्रलय को भी समझाया गया है. ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का एक सहज और आसान तरीका है प्रभु को सदा याद रखना और अपना कर्तव्य करते रहना.

अध्याय नौ

राजविद्याराजरहस्य

जय : जब भगवान पृथिवी पर अवतरित होते हैं, तो क्या वे वैसे ही होंगे, जैसे हम या वे हमसे अलग होते हैं?

दादी मां : भगवान जब मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं तो उनकी लीला मनुष्य और भगवान दोनों तरह की होती है.

अब मैं तुम्हें हिन्दू धर्म के दो सिद्धान्तों को समझाने की कोशिश करती हूं. उदाहरण के लिए मेरी इस चेन, मेरी अंगूठी और इस सोने के सिक्के को देखो. ये सब सोने से बने हैं. तो तुम उन्हें सोने के रूप में देख सकते हो. और तुम हर चीज़ को, जो सोने से बनी है, सोने के रूप में देख सकते हो. वे सोने के ही अलगअलग नाम और रूप हैं. किन्तु तुम उन सबको अलगअलग चीज़ों के रूपों में भी देख सकते हो जैसे-- चेन, अंगूठी, और सिक्का का रूप. चेन, अंगूठी, सिक्का आदि सोने के ही अलगअलग नाम और रूप हैं. इसी प्रकार हम भगवान और उसकी सृष्टि को स्वयं भगवान के विस्तार के रूप में देख सकते हैं. इस विचार (दृष्टिकोण) को अद्वैतदर्शन (non-dualism) कहा जाता है.

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार भगवान एक सत्य है और उसकी सृष्टि दूसरा अलग सत्य है, किन्तु वह भगवान पर निर्भर है. यह द्वैत-दर्शन (dualism) जो चेन, अंगूठी और सिक्का आदि सोने से बनी चीज़ों को सोने से अलग मानता है (गीता 9.0406).

जय : क्या यही वह बात है, जब लोग कहते हैं कि भगवान सब जगह और सब चीज़ों में है?

दादी मां : हां, जय. परमात्मा सूरज है, चांद है, वायु है, आग, पेड़, धरती और पत्थर है. उसी तरह जैसे सोने से बनी हर चीज़ सोना है. इसीलिए हिन्दू पत्थर में और पेड़ में भी भगवान को देखते और पूजते हैं, मानो वे उस रूप में स्वयं भगवान हों.

जय : यदि प्रत्येक वस्तु भगवान से आती है, तो हर वस्तु क्या फिर भगवान बन जायेगी, जैसे सोने की बनी हर वस्तु को सोने में पिघलाया जा सकता है.

दादी मां : हां, जय. सृष्टि और प्रलय का चक्र चलता ही रहता है. यह वैसा ही है जैसे मेरी अपनी चेन, अंगूठी और सोने के सिक्के को पिघला कर सोने में बदलना और फिर सोने का प्रयोग नये आभूषण और सिक्के बनाने में करना ( गीता 9. 0708). पिघलाने के काम को प्रलय कहते हैं. प्रलय के बाद सृष्टि का फिरसे निर्माण होता है और यह प्रलय-निर्माण चक्र चलता रहता है.

जय : यदि भगवान हम ही हैं और हम सब भगवान से ही आते हैं, तब हर कोई भगवान को प्यार क्यों नहीं करता, क्यों उनकी पूजा नहीं करता?

दादी मां : जो सत्य को समझते हैं, भगवान की उपासना करते हैं. वे जानते हैं कि प्रभु हमारे स्वामी हैं और हमारी उत्पत्ति उन्हीं से व उन्हीं के लिए हुई है और हम सब उन्हीं पर निर्भर रहते हैं. इसीलिए वे प्रभु को प्यार करते हैं और उनकी उपासना करते हैं. किन्तु अज्ञानी लोग नहीं समझते और ना ही सर्वव्यापी भगवान में पूर्ण विश्वास करते हैं.

जय : यदि मैं प्रतिदिन भगवान की पूजा करूं, उन्हें प्यार करूं और उन्हें फलफूल चढ़ाऊं, तो क्या वे मुझसे प्रसन्न होंगे और मेरी पढ़ाई में सहायता करेंगे?

दादी मां : भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है:- अपने सब भक्तों की-- जो दृढ़ विश्वास और प्रेम भरी भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं वे स्वयं देखभाल करते हैं (गीता 9.22).

जय : क्या इसका ये अर्थ है कि भगवान केवल उन्हें ही प्यार करते हैं, जो उनकी प्रार्थना और पूजा करते हैं?

दादी मां : भगवान हम सबको एक सा ही प्यार करते हैं, किन्तु यदि हम उनका स्मरण करते हैं और उनकी प्रार्थना करते हैं, तो हम भगवान के ज्यादा समीप आते हैं. इसीलिए हम सबको उनका स्मरण करना चाहिये, उनकी उपासना करनी चाहिये, उनका ध्यान करते हुए श्रद्धाभक्ति और प्रेम से उनके सम्मुख नतमस्तक होना चाहिये.

जय : मैं भगवान कृष्ण के समीप आना चाहूंगा, दादी मां. मैं उनमें और अधिक आस्था कैसे रख सकता हूं, कैसे उन्हें और अधिक प्यार कर सकता हूं?

दादी मां : उन सब अच्छी चीज़ों के बारे में विचार करो, जो भगवान हमारे लिए करते हैं. वे हमें इतनी अलगअलग खाने की चीज़ें देते हैं, जिनका सुख हम भोगते हैं. उन्होंने हमें गर्मी और प्रकाश के लिए सूरज दिया. चांदतारों और रात में बादलों से भरा सुन्दर आकाश देखो. ये सब उनकी सुन्दर सृष्टि है, तो फिर सोचो उनको बनाने वाला स्वयं कितना सुन्दर होगा. प्रभु की उपासना उनकी कृपा के लिए उन्हें धन्यवाद देना है. प्रार्थनामें उन वस्तुओं को मांगना है, जो हमें भगवान से चाहिये. और ध्यानयोग सर्वशक्तिमान् के साथ जुड़ना है. सहायता और मार्गदर्शन के लिए.

जय : जब भगवान एक ही हैं, जो हमें सब कुछ देते हैं, तो दादी मां, आप अपने पूजारूम में इतने देवीदेवताओं की प्रतिमाएं क्यों रखती हैं? केवल एक भगवान (कृष्ण) की ही पूजा (उपासना) क्यों नहीं करतीं?

दादी मां : भगवान कृष्ण ने कहा है, वे, जो अन्य देवीदेवताओं की पूजा करते हैं, उन देवीदेवताओं के द्वारा मुझे ही पूजते हैं. (गीता 9.23). हम किसी भी देवीदेवता की, जिसके साथ समीपता का अनुभव करते हैं, पूजा कर सकते हैं. वह हमारा ईष्टदेव (personal god) कहलाता है. अपना निजी देवता, जो हमारा व्यक्तिगत मार्गदर्शक और रक्षक का काम करता है. अनेक देवीदेवताओं की पूजा एक साथ करने की प्रथा सराहनीय नहीं हो सकती!!

जय : हम भगवान को फलफूल क्यों चढ़ाते हैं?

दादी मां : भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो कोई भी उन्हें एक पत्र, एक पुष्प, एक फल, जल अथवा कोई भी वस्तु श्रद्धाभक्ति से अर्पण करता है, वे न केवल उसे स्वीकार करते हैं, वरन् उसका भोग भी करते हैं (गीता 9.26). इसीलिए हम खाने से पहले प्रार्थना के साथ सदा अपना भोजन भगवान को अर्पित करते हैं. भगवान को अर्पण किया गया पदार्थ प्रसाद या प्रसादम् कहलाता है. कोई भी व्यक्ति भगवान को प्राप्त कर सकता है, जो उनकी पूजा विश्वास, प्रेम और भक्ति के साथ करता है. भक्ति का यह मार्ग हम सबके लिए खुला है.

आस्थाविश्वास की शक्ति की एक कथा इस प्रकार है :

10 . लड़का, जिसने भगवान को खिलाया

एक कुलीन व्यक्ति भोजन अर्पण करके नित्य ही परिवार के ईष्ट देव की पूजा करता था. एक दिन उसे एक दिन के लिए अपने गांव से बाहर जाना पड़ा. उसने अपने बेटे रमण से कहा, देव प्रतिमा को भेंट अर्पित करना. ध्यान रहे, देवता को खिलाया जाये.

लड़के ने प्रतिमा को पूजा घर में भोजन अर्पित किया. किन्तु देवप्रतिमा ने न कुछ खाया न पिया, न ही कोई बात की. रमण ने बहुत देर तक प्रतीक्षा की, परन्तु प्रतिमा तब भी न हिली. किन्तु उसका पक्का विश्वास था कि भगवान अपने स्वर्गसिंहासन से उतर कर आयेंगे, फर्श पर बैठेंगे और भोग लगायेंगे.

उसने पुनःपुनः देवप्रतिमा की प्रार्थना की. उसने कहा, हे प्रभु, कृपा करके धरती पर उतरो और भोग लगाओ. काफी देर हो चुकी है. मेरे पिता मुझसे बहुत नाराज़ होंगे यदि मैंने आपको नहीं खिलाया. प्रतिमा ने एक शब्द भी न कहा.

लड़के ने रोना शुरू कर दिया. उसने ज़ोर से कहा, हे पिता, मेरे पिता ने तुम्हें खिलाने को कहा था. तुम (धरती पर) आते क्यों नहीं? तुम मेरे हाथ से खाते क्यों नहीं?

लड़का कुछ समय तक बहुत रोता रहा. अन्त में देवप्रतिमा मनुष्य के रूप में पूजास्थल से मुस्कुराते हुए उतरी, भोजन के सामने बैठी और भोग लगाया.

देवप्रतिमा को खिलाकर लड़का पूजाकक्ष से बाहर आया. उसके सम्बन्धियों ने कहा, पूजा खत्म हुई. अब हमारे लिए प्रसाद लाओ.

लड़के ने कहा, भगवान ने सब कुछ खा लिया. आज उन्होंने आप लोगों के लिए कुछ नहीं छोड़ा.

सभी लोग पूजाकक्ष में गये. वे यह देखकर कि सचमुच ही देवप्रतिमा ने अर्पित किए हुए भोग को पूरा का पूरा खा लिया था, आश्चर्यचकित अवाक् रह गये.

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान निश्चय ही भोजन ग्रहण करेंगे, यदि तुम पूरी श्रद्धा से, प्रेम भक्ति से उन्हें भोजन अर्पित करो. हममें से अधिकांश लोगों में रमण जैसी आस्था नहीं, श्रद्धा नहीं. उन्हें खिलाना हम नहीं जानते. कहा गया है कि हमारी आस्था भगवान में एक बच्चे जैसी होनी चाहिये, नहीं तो हम भगवान के परमधाम नहीं जा सकेंगे.

जय : दादी मां, यदि कोई व्यक्ति पापी, चोर या डाकू है तो क्या वह भी भगवान से प्यार कर सकता है?

दादी मां : हां, जय. भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है यदि पापी से पापी व्यक्ति भी प्रेम भरी भक्ति से मेरी पूजा करने का निश्चय करता है, तो वह व्यक्ति शीघ्र ही सन्त हो जाता है क्योंकि उसने सही निर्णय लिया है (गीता 9.31). ऐसे डाकू के विषय में एक कथा इस प्रकार है :

 

11. एक लूटेरा डाकूसन्त

हमारे दो लोकप्रिय महाकाव्य (ऐतिहासिक) कथाएं हैं. एक रामायण, दूसरा महाभारत. श्रीमद् भगवद् गीता महाभारत का एक भाग है. इसकी रचना ईसापूर्व 3,100 वर्ष में हुई. मूलतः रामायण की रचना नासा (NASA) की नई खोज के अनुसार लाखों वर्ष पहले हुई होगी. रामायण के मूल लेखक वाल्मीकि नाम के एक ऋषि थे. वाल्मीकि के बाद अन्य सन्त कवियों ने भी रामायण लिखी. भगवान राम के जीवन पर आधारित इस महाकाव्य को बालकों को पढ़ना चाहिये. एक मिथक (प्राचीन कथा) के अनुसार नारद मुनि ने महर्षि वाल्मीकि को रामायण की समस्त घटना को इसके घटने से पहले ही लिखने की शक्ति दी थी.

अपने जीवन के आरम्भिक काल में, वाल्मीकि राहगीरों को लूटने वाला डाकू था. वही उसकी जीविका थी. एक बार महान देवर्षि नारद उस मार्ग से गुज़र रहे थे, वाल्मीकि ने उन पर आक्रमण करके उन्हें लूटने का प्रयत्न किया. देवर्षि नारद ने वाल्मीकि से पूछा वह ऐसा क्यों कर रहा था. वाल्मीकि ने उत्तर दिया कि ऐसा करके ही वह अपने परिवार का पोषण करता था.

देवर्षि ने वाल्मीकि से कहा, जब तुम किसी को लूटते हो, तो तुम पाप कमाते हो. क्या तुम्हारे परिवार के सदस्य भी उस पाप का भागी होना चाहते हैं?

डाकू ने उत्तर दिया, क्यों नहीं? मेरा विश्वास है, वे अवश्य ही उसमें भागी होना चाहेंगे.

देवर्षि ने कहा, बहुत अच्छा, तुम घर जाओ और हर एक से पूछो कि वे तुम्हारे द्वारा घर लाये जाने वाले धन के साथ पाप के भी भागी होना चाहेंगे या नहीं?

डाकू ने उनकी बात मान ली. उसने देवर्षि को एक पेड़ से बांध दिया और अपने घर चला गया. वहां उसने परिवार के हर सदस्य से पूछा, मैं लोगों को लूटकर तुम्हारे लिए धन और बहुतसा भोजन लाता हूं. एक सन्त ने कहा है कि लोगों को लूटना पाप है. क्या तुम उस पाप में मेरे भागीदार बनोगे?

उसके परिवार का कोई भी सदस्य उसके पाप में भागीदार होने को तैयार न था उन सभी ने कहा, हमारा पोषण करना तुम्हारा कर्तव्य है. हम तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं बन सकते.

वाल्मीकि को अपनी ग़लती का अहसास हुआ. उसने देवर्षि नारद से पूछा कि अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वह क्या कर सकता था. देवर्षि ने वाल्मीकि को सर्वशक्तिमान् और सरलतम राम मंत्र जपने के लिए दिया. उसे पूजा करना और ध्यानयोग सिखाया. वनडाकू ने अपने पाप का धन्धा छोड़ दिया और शीघ्र ही वह गुरु नारद की कृपा, मंत्रशक्ति और अपने निष्ठा भरे आध्यात्मिक अभ्यास के कारण एक महान ऋषि और कवि बन गया.

जय, एक और कथा है, जो तुम्हें सदा याद रखनी चाहिये. यह कथा गीता के उन श्लोकों को दर्शाती है, जो कहते हैं कि भगवान हम सबका ध्यान रखता है (गीता 9.1718).

12 . पदचिन्ह

एक रात एक व्यक्ति ने एक सपना देखा. उसने देखा कि वह भगवान के साथ एक सागरतट पर चल रहा था. आकाश के आरपार उसने अपने जीवन के दृश्य देखे. हर दृश्य के साथ उसने रेत में दोहरे पदचिन्ह देखे, अपने और भगवान के.

जब उसके जीवन का अंतिम दृश्य उसके सामने आया, तो उसने वापिस घूमकर रेत में पदचिन्हों को देखा. उसने देखा कि कई बार उसके जीवन के पथ पर केवल एक ही के पदचिन्ह थे. उसने यह भी पाया कि यह उसके जीवन के सबसे दुखद समय में ही हुआ, जब वह निम्नतम अवस्था में था.

इससे उसे बड़ी वेदना हुई. उसने भगवान से इसके बारे में पूछा.

भगवान, आपने कहा था कि आपका न कोई प्रिय है न अप्रिय. किन्तु आप हमेशा उनके साथ हैं, जो आपकी उपासना करते हैं (गीता 9.29). मैं देखता हूं कि मेरे जीवन के सबसे बुरे समय में मार्ग में एक ही जोड़े के पदचिन्ह हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि जब मुझे आपकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, तब आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?

भगवान ने उत्तर दिया, मेरे प्यारे बच्चे, तुम मेरी अपनी आत्मा हो, तुम मेरे प्रिय हो और मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा, भले ही तुम मुझे छोड़ दो. तुम्हारी परीक्षा और वेदना की घड़ी में, जब तुम्हें केवल एक ही जोड़ा पदचिन्ह दिखाई देते हैं, तुम्हें ऐसा इसलिए लगा क्योंकि मैं तुम्हें उठाकर ले जा रहा था. जब तुम मुश्किल में होते हो, तो वह तुम्हारे अपने कर्म के कारण होता है. वह तभी होता है, जब तुम्हारी परीक्षा ली जाती है ताकि तुम और शक्तिशाली हो सको.

भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है, मैं उन भक्तों की, जो सदा मेरा स्मरण करते हैं, मुझे प्रेम करते हैं, स्वयं देखभाल करता हूं. (गीता 9.22)

अध्याय नौ का सार द्वैतदर्शन (Dualism) भगवान को एक तत्त्व के रूप में देखता है और सृष्टि को भगवान पर निर्भर दूसरा अलग तत्त्व के रूप में. अद्वैतदर्शन (non-Dualism) भगवान और उसकी सृष्टि को एक ही देखता है. भगवान हम सबको एक सा ही प्यार करते हैं, किन्तु वह अपने भक्तों में व्यक्तिगत रुचि लेते हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्ति उनके अधिक समीप होते हैं. यह उसी प्रकार है जैसे, जो आग के समीप बैठता है, अधिक गर्मी पाता है. ऐसा कोई पाप या पापी नहीं, जो क्षमा योग्य न हो. सच्चे पश्चाता